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अभिनव भारत राग: कोरोना की चीखों में आर्थिक-रागों का फ्यूजन
May 18, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • सम्पादकीय

. उमेश त्रिवेदी . लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है. साआभार दैनिक समाचार पत्र सुबह सवेरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोविड-19 की चीत्कारों और चीखों में आत्म-निर्भर भारत अभियान के मंत्रोच्चार की आर्थिक-रागिनियों के फ्यूजन से राष्ट्रवाद के समवेत स्वरों में अभिनव भारत-राग१ का जो श्रॉक-म्युजिकर क्रिएटर किया हैए उसे सुनने के बाद सभी भारतवासी जहनी तौर पर सुख-दुख के दायरों से मुक्त हो सकते हैं। अभिनव भारत राग की परिकल्पना में प्रधानमंत्री मोदी ने हिन्दुस्तान की सड़कों पर पसरी प्रवासी मजदूरों की भूखए गरीबीए गुरबतए बदहाली और आंसूओं के साए में भारत के लिए विकास के अवसरों की अभूतपूर्व थीसिस प्रस्तुत की है। मोदी ने कोविड-19 की महामारी से जहरीले संघर्ष को नए भारत के पुनर्निर्माण से जोड़ दिया है। बकौल मोदी अब देश को नई प्राण शक्तिए नई संकल्प शक्ति के साथ आगे बढ़ना है। आत्म-निर्भरता की नई थीसिस के सिनॉप्सिस का विमर्श श्लोकल के लिए वोकलर होने पर केन्द्रित है। मोदी ने सीधे-सीधे स्वदेशी की राह पकड़ने के बजाए लोकल के जरिए आत्मनिर्भरता का अगला सफर तय करने की नीति अख्तियार की है। श्देशी-विदेशी लोकल के घुमावदार स्वदेशी रास्तों से आत्मनिर्भरता के चारों धाम की यह विकास यात्रा कौतुहल पैदा करने वाली है।

देश के आर्थिक-गलियारे यह जानने को आतुर हैं कि ग्लोबल वर्ल्ड के कैनवास में हावीश्लोकल के सिंथेटिक रंगों के गहरें चित्रांकनों में स्वदेशीर के श्वाटर कलर के रेखा चित्रों को कैसे जगह मिल पाएगी भारत में स्वदेशी का विचार काफी पुराना है। राजनीतिक जरूरतों के मद्देनजर इसे अलग-अलग स्वरूपों में पेश किया जाता रहा है। आत्मनिर्भरता की दिशा में श्लोकल के लिए श्वोकल होने का आह्वान भी राजनीतिक निहितार्थों से परे नहीं हैं। वैसे मंगलवार 12 मई के संबोधन में मोदी ने स्वदेशी शब्द का सीधा इस्तेमाल नहीं करते हुए श्लोकलर शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने श्लोकलर के लिए श्वोकल होने का आह्वान करके हाथ घुमाकर पीछे से स्वदेशीर का कान पकड़ा है। मोदी की प्रस्तुति के घुमावदार रास्ते स्वदेशी को आर्थिक राष्ट्रवाद के उन गलियारों की ओर भी केलते हैंए जहां देश की आर्थिकी के बारे में कोई भी सवाल राष्ट्रद्रोह के आरोपों का सबब हो सकता है। बहरहालए दुनिया के मौजूदा आर्थिक ताने-बाने में स्वदेशी अवधारणाओं की अपनी परेशानियां और सीमाएं हैं। इन्हें पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। मंगलवार को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद स्वदेशी जागरण मंच के अरूण ओझा ने बीबीसी से एक साक्षात्कार में कहा था कि श्कोरोना महामारी के बाद सभी देशों में आर्थिक-राष्ट्रवाद आएगा। मंच ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के विचार का स्वागत किया है। अरूण ओझा का कहना है कि हम तो वर्षों से आत्मनिर्भरता और स्वदेशी मॉडल की वकालत करते रहे हैं। राष्ट्रवाद की महत्ता निर्विवाद हैए लेकिन मौजूदा दौर में राजनेताओं के बीच व्यास राजनीतिक विद्रूपता और कटुता ने राष्ट्रवाद की परिभाषाओं को दूषित कर दिया है। आर्थिक-राष्ट्रवाद की महत्ता को कमतर आंकना कदापि मुनासिब नहीं हैं।

लेकिन मौजूदा शासन व्यवस्था में जब राष्ट्रवाद की चर्चा होती हैए तो कान खड़े होने लगते हैं। यह समझना कठिन होता जा रहा है कि वर्तमान काल खंड में सामाजिकए राष्ट्रीय और निजी जीवन में कौन सा राष्ट्रवाद धारण करना आपकी सेहत के लिए मुनासिब होगा। राष्ट्रवाद की अदृश्य लक्ष्मण रेखाएं कहीं भी आपकी पैरों के नीचे आ सकती हैं और आप राष्ट्रवाद का चीरहरण करने वाले रावण सिद्ध किए जा सकते हैं। राजनीति के शॉपिंग मॉल में राष्ट्रवाद के कई ब्राण्ड उपलब्ध हैं। राष्ट्रवाद का राजनीतिक धंधा सबसे ज्यादा लाभांश देने वाला सिद्ध होता रहा है। पिछले एक दशक में राम-मंदिरए भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धोन्मादए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्यों राष्ट्रवाद की अलग-अलग परिभाषाएं लिखी जाती रही हैं। इनका निचोड़ यही है कि मोदी सरकार के कार्यकलापों पर कोई भी सवाल उठाना देशद्रोह की श्रेणी में आता है। आर्थिक राष्ट्रवाद लोगों को इसलिए आशंकित कर रहा है कि इन दिनों राजनीति के बाजार में राष्ट्रवाद अपने राजनीतिक विरोधियों और प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल होने लगा है। आर्थिक राष्ट्रवाद देश में अनुशासनए मितव्ययिता और विकास की प्राथमिकताओं को निर्धारित करने के मामलो में बेहतर रोडमैप हो सकता है। सवाल सरकार की नीयत पर उठते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोविड-19 महामारी की महा-आपदा को आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज का ऐलान किया है। भारत के करोड़ों नागरिक फिलवक्त कोरोना के लॉकडाउन से उदभूत सवालों और समस्याओं से जूझ रहे हैं।

लोगों की अपेक्षा थी कि बीस लाख करोड़ रुपए का यह आर्थिक पैकेज आम जनता के सवालों को एड्रेस करेगाए उनकी सहमीए ठिठकी और बोझिल जिंदगी को रफ्तार देगाए लेकिन पांच दिनों में सामने आए तथ्य निराश करने वाले है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की मैराथन प्रेसब्रीफिंग के बाद भी यह धुंधलका साफ नहीं हो पाया है कि कोरोना के उदभूत सवालों और समस्याओं से निपटने के लिए सरकार का रोडमैप क्या है: कोरोना के महाप्रकोप से निपटने के लिए घोषित 20 लाख करोड़ रुपए का वित्तीय पैकेज राजनीतिक माया जाल बन कर रह गया