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भारत-चीन सीमा विवाद: रिश्ते और बिगड़ेंगे या सुधरने की गुंजाइश बाक़ी है?
June 16, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • देश / विदेश

अब तक सीमा-विवाद का हल जिस तरह से दोनों देश निकालना चाह रहे थे, वो नाकाफ़ी है. दोनों देशों को कुछ नए रास्ते अपनाने की ज़रूरत है.

भारतीय सेना का कहना है कि भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में सोमवार रात को दोनों देशों की सेना में जोरदार संघर्ष हुआ है. सीमा पर हिंसक झड़प में एक भारतीय अफ़सर और दो सैनिकों की मौत हो गई है. चीन की सेना को भी नुकसान उठाना पड़ा है. हालाँकि इस पर चीन का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. दोनों देशों के सीमा पर ये विवाद अप्रैल के तीसरे हफ़्ते से जारी है. दोनों देशों के बीच बातचीत से इस मसले को सुलझाने के लिए जून की शुरुआत में ब्रियेडियर स्तर की बातचीत भी हुई, मेजर जनरल स्तर की बात हुई, कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई. लेकिन बीती रात विवाद ने हिंसक रूप ले लिया.

आख़िर इसके पीछे की वजह क्या है? जेएनयू में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि इसके पीछे एक पूरा पैटर्न है. स्वर्ण सिंह चीन मामलों के जानकार हैं. वे कहते हैं कि बीती रात की घटना से स्पष्ट हो गया है कि अब तक सीमा-विवाद का हल जिस तरह से दोनों देश निकालना चाह रहे थे, वो नाकाफ़ी है. दोनों देशों को कुछ नए रास्ते अपनाने की ज़रूरत है. स्वर्ण सिंह की मानें तो चीन के साथ सीमा विवाद है उसमें पिछले आठ- 10 सालों में घुसपैठ के मामलों में तेज़ी देखने को मिली पहले ऐसे वाकये कम होते थे. लेकिन अब पिछले साल के आँकड़े बताते हैं कि 650 बार ऐसी कोशिश हुई हैं. यानी घुसपैठ की कोशिशें लगातार बढ़ रही हैं.

भारत-चीन के पास विकल्प क्या है? प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि बातचीत ही एक ज़रिया है जिससे इसे सुलझाया जा सकता है. पिछले 40 सालों से भारत और चीन दोनों ने कोशिश की है कि सीमा पर शांति और स्थिरता कायम रह सके. गौरतलब है कि पिछले दो साल में भारत और चीन के बीच दो अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई है. एक अप्रैल 2018 में चीन के वुहान शहर में. जहाँ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत हुई थी और दूसरी बार चेन्नई के पास ममल्लपुरम में दोनों एक बार फिर से मिले थे. इन दोनों मौकों पर दोनों देशों के नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई थी कि अपनी सेनाओं को शांति बनाए रखने के निर्देश देंगे. स्वर्ण सिंह का मानना है कि इस वक़्त चीन के प्रति दुनिया भर में काफ़ी आक्रोश है. इसलिए चीन नहीं चाहेगा कि परिस्थिति युद्ध वाली किसी भी सूरत में बने. चीन के पास भारत से संबंधों को उलझाने का कोई विकल्प नहीं है. ये वक़्त दोनों देशों के लिए सीखने और सबक लेने का है. उनके मुताबिक़ ज़रूरत इस बात की है कि सीमा पर शांति बनाए रखने से आगे बढ़ते हुए सीमा विवाद सुलझाया जाए. लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर काफ़ी विवाद है, जिसे सुलझाए रखने की ज़रूरत है. प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि सीमा विवाद को सुलझाने से दोनों देशों की सेनाओं के बीच जो कंफ्यूजन है वो ख़त्म हो जाएगा.ये तात्कालिक क़दम है जो उठाया जा सकता है. दोनों सेनाओं के बीच फ्लैग मीटिंग होती है, उस दौरान भी इस तरह की सूचनाओं का आदान प्रदान किया जा सकता है.

भारत और चीन एक दूसरे के लिए ज़रूरी भी, मजबूरी भी भारत चीन के लिए निवेश का एक बहुत बड़ा मार्केट है. भारत और चीन के बीच कारोबार में किस तरह बढ़ोतरी हुई है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इस सदी की शुरुआत यानी साल 2000 में दोनों देशों के बीच का कारोबार केवल तीन अरब डॉलर का था जो 2008 में बढ़कर 51.8 अरब डॉलर का हो गया. इस तरह सामान के मामले में चीन अमरीका की जगह लेकर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया. 2018 में दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते नई ऊंचाइयों पर पहुँच गए और दोनों के बीच 95.54 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. ये इस बात को दर्शाता है कि दोनों देश एक दूसरे की आर्थिक ज़रूरत भी है.. अगर किसी भी सूरत में भारत को दूसरे देशों को ये दवा निर्यात करनी होगा तो इस दवा का कच्चा माल जिसे एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं, चीन से आयात किया जाता है. इतना ही नहीं दूसरी निर्यात की जाने दवा क्रोसीन, जिसका एपीआई पैरासीटामॉल भी चीन से आता है. असल में, संसद में भारत सरकार के एक बयान के मुताबिक़, भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां क़रीब 70 फ़ीसदी एपीआई चीन से आयात करती हैं.किसी बड़े देश के साथ उलझने का मतलब नक़सान भारत का भी होगा. इसके अलावा कॉटन यानी कपास, कॉपर यानी तांबा, हीरा और अन्य प्राकृतिक रत्न भी भारत चीन को बेचता है. इस वजह से स्वर्ण सिंह का मानना है कि दोनों देशों के पास बातचीत ही एक मात्र रास्ता बचता है.