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बिक रहा है पानी पवन बिक न जाए
July 25, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • लेख /आलेख

(दुर्गेश शर्मा - लेखक म.प्र. कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता है)

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है

बिक रहा है पानी पवन बिक न जाए

बिक गयी है धरती गगन बिक न जाए

चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं

डर है की सूरज की तपन बिक न जाए

हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति

डर है की कहीं धर्म बिक न जाए

देकर दहेज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को

कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए

 हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता

कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए

सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद और विधायक

डर है की कहीं संसद भवन और विधानसभा बिक न जाए

मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं

डरता है मुर्दा कहीं कफ़न बिक न जाए !!!