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'एक चुटकी सिंदूर की कीमत' बताने वाले जज साहब ने औरतों के बारे में क्या सोचा?
July 3, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • सम्पादकीय

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने तीन दिन पहले तलाक़ के एक मामले कि सुनवाई के दौरान एक टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि अगर कोई औरत मांग में सिंदूर न लगाए और सुहाग की निशानी 'शाका-पोला' (चूड़ियां) पहनने से इनकार करे तो इसका मतलब है कि वो अपनी शादी की इज़्ज़त नहीं करती और उस शादी में रहना नहीं चाहती. ऐसी औरत से पति तलाक़ लेना चाहे तो कोर्ट इस तलाक को मंजूर करती है.

कुछ और कहूं, इससे पहले ये दो किस्से सुन लीजिए. यूपी बोर्ड की आठवीं की केमिस्ट्री की किताब में एक चैप्टर था,लेड टेट्राऑक्साइड पर. केमिकल नाम था-pb304. हिंदी में सीसा कहते हैं. किताब में लिखा था ज़हर होता है. इंसान खा ले तो मर जाए. फिर लिखा था, सिंदूर में यही लेड टेट्राऑक्साइड मिलाया जाता है यानी ज़हर. उस दिन मैंने घर लौटकर मां को बताया कि ये जो आप लगाती हैं रोज, ये ज़हर है. घर के कुछ मर्दो ने मज़ाक में कहा, "अरे बेटा फ़िक्र मत करो. ज़हर को ज़हर ही काटता है." इसका मतलब मुझे तब समझ नहीं आया था. बचपन में गांव में हमारे यहां नई बहू गौना करके आई थी. रिश्ते में मेरी चाची लगती थीं. शादी के 10 दिन बाद ही उनका माथा और सिर बुरी तरह सूज गया. वो दिन-रात मेरी मां से चार गुना ज्यादा नारंगी रंग का सिंदूर लगाए रहती थीं. उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि इलाज के लिए इलाहाबाद ले जाना पड़ा. डॉक्टर ने कहा कि उसे सिंदूर से इंफेक्शन हो गया था. सिंदूर मतलब लेड टेट्राऑक्साइड. मतलब ज़हर.

कुल मिलाकर बात ये है कि अगर आपकी पत्नी सुहाग की निशानियां सिंदूर, चूड़ी आदि पहनने से इनकार करे तो इस आधार पर न सिर्फ तलाक़ मांगा जा सकता है, बल्कि वो आपको थाली में सजाकर मिल भी जाएगा. इतना ही नहीं, कोर्ट अपने बयान में ये भी कहेगा, "सिंदूर न लगाने का अर्थ है कि औरत खुद को कुंवारी दिखाना चाहती है." चीफ़ जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस सौमित्र सैकिया ने तलाक़ के इस मामले में फैसला सुनाते हुए साफ़ शब्दों में कहा, "पत्नी का शाका-पोला और सिंदूर पहनने से इनकार करना उसे कुंवारी दिखाता है. इसका साफ़ मतलब है कि वह अपना विवाह जारी नहीं रखना चाहती."

मर्द सुहाग की निशानी क्यों नहीं पहनते?

हालांकि हाईकोर्ट से पहले फैमिली कोर्ट ने उसे पति को तलाक़ देने के बजाय लताड़ लगाई थी और यह कहते हुए तलाक़ देने से इनकार कर दिया था कि पत्नी ने पति के साथ कोई क्रूरता नहीं की है. लेकिन उससे ऊंची अदालत में बैठे दो पुरुष जजों को ऐसा नहीं लगा. पूछ तो दीपिका पादुकोण रमेश बाबू से रही थीं एक चुटकी सिंदूर की कीमत, लेकिन लगता है कि जज साहब को बेहतर पता है. खैर, कुछ तीन दशक पीछे चलते हैं. जब टेलीविज़न और सिनेमा नया-नया रंगीन हुआ तो अचानक शादी के पहले और शादी के बाद की हिरोइन का फ़र्क साफ़ नजर आने लगा. ब्लैक एंड वाइट सिनेमा में भी मीना कुमारी के माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर होता था, लेकिन वो पर्दे पर ऐसे शोर मचाकर अपनी उपस्थिति नहीं दर्ज कराता था. मगर सिनेमा रंगीन होते ही माथे के बीचोंबीच की वो लाल लकीर साफ़ नजर आने लगी. राजेश खन्ना का बेलबॉटम पैंट तो फेरों के बाद भी वही रहता, मुमताज जरूर लाल परी में तब्दील हो जाती. विनोद मेहरा के शर्ट के दो बटन शादी के बाद भी खुले रहते उसकी छाती के घने बालों का नजारा दिखाते, लेकिन रेखा की लाल लिप्सटिक, लाल बिंदी में एक और लाल रंग जुड़ जाता- मांग में भरा लाल सिंदूर.

अदालत ऐसा कैसे सोच सकती है?

हालांकि पश्चिम के सिनेमा का रंग थोड़ा दूसरा है. 'द अफेयर की शुरुआत ही ऐसे होती है कि लड़की एक स्विमिंग पूल में लड़के से टकराती है. आंखों से इशारा करती है. लेकिन इससे पहले कि वो आगे कुछ कहे, उसकी नजर लड़के के अंगूठी पर पड़ जाती है और मुंह से निकलता है, "ओह.... बैड लक." विदेशी लड़का सुहाग की निशानी उंगली में पहनकर घूम रहा है. बेवकूफ़ बनाने का कोई चांस नहीं. यही तो फ़र्क है. वहां दोनों जेंडर में शादीशुदा होने के लक्षण एकसमान हैं. यही तो कह रहे हैं न हम. नई बात, नई सोच, नई मांग, नई लड़ाई और क्या है? यही तो कि औरत और मर्द एक बराबर हैं. दोनों के अधिकार बराबर हैं. मर्द का कोई विशेष अधिकार नहीं, औरत का कोई अधिकार मर्द से कम नहीं. एकदम सीधी, सरल बात है. ये जेंडर बराबरी की किताब का पहला चैप्टर है. एकदम बुनियादी सबक, लेकिन ये पहला सबक भी हमारे मर्दो को अब तक ढंग से याद नहीं हुआ है. लड़कियां तो इस चैप्टर को कब का पार करके आगे पहुंच चुकी. अब उनके सवाल दूसरे हैं. वो बराबर काम का मर्दो के बराबर पैसा मांग रही हैं. संपत्ति में बराबर का हक मांग रही हैं. उन्होंने चूड़े उतार दिए, सिंदूर पोंछ दिया. वो काम पर जा रही हैं. वो और भी बहुत कुछ मांग रही हैं, जबकि खुद नख-शिख कंवारे नजर आते मर्द अभी भी सिंदूर, बिंदी और चूड़ी में उलझे

पितृसत्ता से घिरा कानून

काग़ज पर बाप की 500 बीघा जमीन में से 250 अब लड़की की है. कागज पर लिखा है बराबर की मजदूरी, बराबर का पैसा, बराबर का सब अधिकार. लेकिन कागज पर लिख देने और जिंदगी में हो जाने में उतना ही फ़ासला है, जितना चाहने और पा लेने में. जिन्हें कानून का पालन करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, वो भी तो इसी समाज हैं. वो आज भी अपनी जड़ों और बुनियादी संरचना में निहायत सामंती और मर्दवादी हैं. इसीलिए वो बलात्कार की शिकार लड़की से सवाल पूछता है कि वो रेप के बाद सो कैसे सकती है. इसलिए वो फैसला सुनाता है कि औरत की कमजोर ना का मतलब हां होता है. कानून की किताब से इतर पितृसत्ता के तमाम विशेषाधिकार अब भी न्यायालय की चारदीवारी के भीतर सुरक्षित हैं. वो बदलेगा, जब समाज बदलेगा. वरना यही होगा, जो हुआ. पति ने तलाक मांगा, जजों ने तलाक़ दे दिया. हालांकि मंगलवार की सुबह गुवाहाटी हाईकोर्ट के एक ऊची मेहराब वाले कमरे में एक औरत के लिए सिंदूर न लगाने की ये सज़ा मुकर्रर करने वाले किसी भी मर्द को देखकर ये कोई नहीं बता सकता था कि वो शादीशुदा हैं या नहीं. ये कानून कागज पर कानून बनाने से नहीं बदलता. ये सोच बदलने से बदलता है, समाज बदलने से बदलता है. ये उनके बदलने से बदलता है, जिन्हें इस कानून ने हमेशा हर हक, हर सुख से वंचित रखा है. ये क़ानून औरतों के बदलने से बदलता है. जब वो सिंदूर लगाने से इनकार कर देती हैं, बात मानने से इनकार कर देती हैं, आदेश लेने से इनकार कर देती हैं, सिर झुकाने और लात खाने से इनकार कर देती हैं.