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हॉन्ग कॉन्ग पर चीन की वादाख़िलाफ़ी विशेष दर्जा ख़त्म करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं.
May 30, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • देश / विदेश

हॉन्ग कॉन्ग का विशेष दर्जा ख़त्म करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं. हॉन्ग कॉन्ग की सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी आलोचना की है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ हॉन्ग कॉन्ग के सुरक्षा मंत्री जॉन ली ने संवाददाताओं से कहा कि उनकी सरकार को डराया नहीं जा सकता है और वे नए कानून को लेकर आगे बढ़ते रहेंगे. इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग को दिए जा रहे आर्थिक विशेषाधिकारों का औचित्य ख़त्म हो गया है. इस फ़ैसले से कुछ अधिकारियों पर पाबंदी का ख़तरा भी मंडरा रहा है.

ट्रंप ने क्या कहा और हॉन्ग कॉन्ग में प्रतिक्रिया हॉन्ग कॉन्ग के न्यायमंत्री टेरीज़ा चेंग का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस आधार पर ये फैसला लिया है, वो पूरी तरह से ग़लत है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की ज़रूरत क़ानूनी थी और ऐसा करना ज़रूरी था. हाल के दिनों में राष्ट्रपति ट्रंप चीन को लेकर इतने मुखर कभी नहीं देखे गए. उन्होंने कहा कि हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्ता को लेकर किया गया वादा चीन ने तोड़ दिया है और अब इस इलाके को अमरीका की तरफ़ से मिलने वाली आर्थिक सहूलियतों की कोई वजह नहीं रह गई है.

चीन से आने वाले छात्रों पर अमरीका का फ़ैसला इस बीच, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन से आने वाले उन छात्रों और शोधकर्ताओं के अमरीका आने पर रोक लगा दी है जिनके संबंध पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से हैं. इस फैसले का मक़सद ये बताया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन अमरीका की बौद्धिक संपदा और टेक्नॉलॉजी छात्रों के जरिए हासिल करने की चीन की कोशिश को नाकाम करना चाहता है.

क्रिस पैटन का बयान हॉन्ग कॉन्ग में आख़िरी ब्रितानी गवर्नर रहे क्रिस पैटन का कहना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर इस कदर नर्वस हैं कि वो एक नए शीत युद्ध का जोखिम उठा रहे हैं. इतना ही नहीं वे एशिया के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र के तौर पर हॉन्ग कॉन्ग की हैसियत को भी ख़तरे में डाल रहे हैं.हॉन्ग कॉन्ग का नया सुरक्षा कानून क्या कहता है? सबसे पहले तो चीन ने अपनी रबर स्टांप पार्लियामेंट में इस प्रस्तावित कानून का मसौदा पेश किया, जिस पर 28 मई को संसद में वोटिंग हुई और ये पारित कर दिया गया. इसके बाद ही ये प्रस्ताव कानून की शक्ल ले पाएगा. हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित कानून के बारे में पूरी जानकारी सामने नहीं आई है पर लोगों की कई चिंताएं हैं. जो बातें अभी तक हमें मालूम हैं, उसके अनुसार...

चीन ऐसा क्यों कर रहा है? हॉन्ग कॉन्ग के लोग डरे हुए क्यों हैं? हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित कानून को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है, इसलिए इसके प्रावधानों को लेकर फ़िलहाल पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन फिर भी हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को डर है प्रस्तावित कानून की वजह से उनके नागरिक अधिकार छिन सकते हैं. चीन मामलों के जानकार विली लैम चिंता जताते हैं कि इस कानून के तहत लोगों को चीन की आलोचना के अपराध में सज़ा दी जा सकती है. चीन के मुख्य भूभाग में ऐसा होता है. लोगों के इर की एक और वजह भी है. बहुत से लोगों को ये लगता है कि हॉन्ग कॉन्ग में जिस किस्म की आज़ादी आज की तारीख में हासिल हैं, अगर उसमें कटौती की जाती है तो एक आर्थिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में हॉन्ग कॉन्ग का आकर्षण कमज़ोर पड़ जाएगा. पर्यवेक्षकों का कहना है कि हॉन्ग कॉन्ग में न केवल राजनीतिक भविष्य बल्कि आर्थिक भविष्य भी दांव पर लगा हआ है.

चीन के पास क्या रास्ता है? बेसिक लॉ के अनुसार चीन में लागू कानून जब तक कि तीसरी अनुसूची में दर्ज न हो जाएं, हॉन्ग कान्ग में नहीं लागू हो सकते हैं. वहां पहले से कुछ क़ानून दर्ज हैं लेकिन उनमें ज़्यादातर प्रावधान गैर-विवादास्पद थे और विदेशी नीति के विषयों से जुड़े हुए हैं. हालांकि चीन के पास और भी रास्ते हैं. चीन के मुख्य भूभाग में लागू कानून हॉन्ग कॉन्ग में 'डिक्री' यानी कानून का दर्जा रखने वाले आधिकारिक आदेश के ज़रिए लागू किए जा सकते हैं. इसका मतलब हुआ कि ऐसा करने की सूरत में हॉन्ग कॉन्ग की संसद के अधिकार को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा. हॉन्ग कॉन्ग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लैम ने पहले ही कह रखा है कि वो इस कानून को जल्द से जल्द पारित कराने के लिए चीन की सरकार का सहयोग करेंगी. आलोचकों का कहना है कि ये 'एक देश, दो सिस्टम' की अवधारणा का सरासर उल्लंघन है जो हॉन्ग कॉन्ग के लिए काफी अहमियत रखता है. प्रोफ़ेसर चान कहते हैं कि अगर किसी राष्ट्रीय कानून में किसी बात पर कोई रोक लगाई जाती है तो उसे पहले तीसरी अनुसूची में जोड़ा जाना चाहिए और ये रास्ता हॉन्ग कॉन्ग की संसद से होकर जाता है क्योंकि दोनों की न्याय व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं. वे कहते हैं, "दोनों जगहों पर जो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम लागू हैं, वो अलग मूल्यों पर आधारित हैं. इसलिए किसी बात को अपराध करार देने का फैसला केवल हॉन्ग कॉन्ग को करना चाहिए न कि चीन की केंद्रीय सरकार को."