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कैसे मिलेगा राजस्व अदालतों से न्याय? नौकरशाहों में प्रतिभा, क्षमता एवं दक्षता की कमी
September 16, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • मध्यप्रदेश

राजस्व अदालतो से न्याय दान का पवित्र कार्य संभव नहीं हैं। राजस्व अदालतों को बंद कर दिया जाना चाहिए।

बैतूल जिले से -: आशीष पेंढारकर की खबर

मप्र राज्य की राजस्व न्याय प्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं, राजस्व न्याय प्रणाली अपनी विष्वसनीयता खोते चली जा रहीं हैं, राजस्व अदालते भ्रष्टाचार का दूसरा रूप बन चुकी हैं, राजस्व अदालते अपने गलत फैसले, पक्षपात पूर्ण फैसलो के लिए बदनाम हैं, राजस्व अदालतो से न्याय दान का पवित्र कार्य संभव नहीं हैं। राजस्व अदालतों को बंद कर दिया जाना चाहिए। राजस्व अदालते उन मामलों में तो बिलकुल ही निष्पक्ष नहीं हैं जिसमें एक पक्षकार मप्र राज्य सरकार हैं तो दूसरा पक्षकार आम आदमी हैं। जिला स्तर पर, संभाग स्तर पर और प्रदेष स्तर पर राजस्व अदालते राज्य सरकार के विरूद्ध फैसला लिखने अथवा निर्णय करने या फिर राज्य सरकार की जांच ऐजेन्सी के विरूद्ध कोई आदेष करने से डरती हैं। राजस्व न्यायालय तो मुकदमों में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की प्रवक्ता या डाकघर की भूमिका अदा करती हैं, सरकारी जांच ऐजेन्सी ने कोई मुकदमा दाखिल कर दिया हैं तो सरकारी दस्तावेजो में दर्ज तथ्य को वेद वाक्य या देव वाणी मान लेती हैं।

राजस्व राजस्व अदालतों में खनिज अपराध के मुकदमें चलते हैं जिसकी जांच ऐजेन्सी खनिज विभाग हैं। खनिज विभाग ने अदालत में पैसा मुकदमा पेष कर दिया हैं जिसमें संपूर्ण तहकीकात तो पुलिस ने करी हैं और खनिज विभाग ने गणना पत्रक तैयार करके पेष कर दिया हैं। खान एवं खनिज अधिनियम 1957 एवं मप्र रेत नियम 2019 में संपूर्ण वैधानिक कार्यवाही तो स्वयं खनिज निरीक्षक द्वारा किया जाना वैधानिक रूप से आवष्यक हैं। मुकदमा अदालत में चल नहीं सकता हैं, वैधानिक दोष मौजूद हैं पर अधिवक्ता की आपत्ति को दरकिनार करके अदालते मुकदमा चलाती हैं, जो कि विधि, न्याय एवं मानवाधिकारों का हनन हैं। इसी कारण अदालत में तमाम मुकदमों में कई तरह के वैधानिक दोष मौजूद हैं, अपराध को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, आवष्यक साक्ष्य नहीं हैं, स्वतंत्र साक्षी नहीं हैं, कल्पना से परे खनिज अपराध की कथा हैं, वैधानिक प्रक्रिया का पालन खनिज निरीक्षक द्वारा नही किया गया हैं तब भी इस तरह के अपंग, अपाहिज, लंगड़े, लूले मुकदमें अदालत में सुनवाई दौड़ में शामिल कर लिए जाते हैंराजस्व न्यायालय की गलत दोषसिद्धि से परेषान, आम नागरिक संभाग आयुक्त के बाद प्रमुख सचिव के पास पहुंचता हैं तब तक 3 वर्ष निकल चुके होते हैं। अदालत में कोई भी व्यक्ति जब मुकदमा लड़ता हैं तो उसे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्ट उठाना पड़ता हैंअंत में न्याय तो केवल हाई कोर्ट में मिलता हैं।

राजस्व न्यायालय कलेक्टर, संभागआयुक्त और प्रमुख सचिव खनिज साधन विभाग का फैसला अंततः हाई कोर्ट में जाकर पलट जाता हैं, न्यायालय आरोपी को दोषमुक्त कर देती हैं तो इसका मतलब हैं कि इन तीन अदालतों का फैसला गलत था। राजस्व न्यायालय के इन पदों पर बैठने वाले कोई और नहीं बल्कि आईएएस अधिकारी हैं जिसे भारत में सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता हैं। कई तरह के सवाल खड़े होते हैं जिनका उत्तर तो कभी नहीं मिलेगा। केवल इतना समझ में आता हैं कि राजस्व न्यायालय से न्याय दान का पवित्र कार्य संभव नहीं हैं तो ऐसी अदालते हमारे किस काम की हैं।

भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाले बहुत कम अधिवक्ता देष में हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील रामजेठ मलानी सवाल खड़ा करते थें, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रषांत भूषण सवाल खड़े करते हैं, मप्र राज्य में राजेन्द्र श्रीवास पूर्व न्यायाधीष सवाल खड़े करते ही नहीं बल्कि न्यायधीषों के भ्रष्टाचार उजागर करते हैं तो इनको व्यापक जनसमर्थन मिलता भी रहा हैं। भारत में कानून, न्याय और मानवाधिकारों के सवाल इन तीन व्यक्तियों के अतिरिक्त तो कोई दूसरा अधिवक्ता तो उठाता नहीं हैं जबकि पीड़ित तो सभी हैंभारत के संविधान में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई हैं फिर भी अधिवक्तागण सवाल नहीं उठाते हैं बल्कि उनके द्वारा पैरवी किए गए मामले कही अखबार में प्रकाषित नहीं हो जाए उससे भी डरते हैं। अधिवक्ता को केवल अपनी वकालत के पेषे की चिंता होती हैं, वकालत के पेषे में उसकी साख बरकरार रहना चाहिए इसके अतिरिक्त कोई दूसरी चिंता नहीं होती हैं। अदालत के गलत फैसलो पर वकील खामोष रहता हैं, केवल एक सलाह देता हैं कि अपील कर दों तो अपील हो जाती हैं, मामला यही पर खत्म हो जाता हैं। एक अदालत का फैसला गलत हैं तो दूसरी अदालत फिर तीसरी अदालत में अपील दर अपील और रिविजन दर रिविजन करते चले जाईए। अदालत के गलत फैसले को व्यवस्था में ही गलत नहीं माना जाता हैं। आम नागरिको का कोई विरोध नहीं हैं तो किसी राजनीतिक दल की कोई आपत्ति भी नहीं हैं।

राज्य सरकार का यह संवैधानिक दायित्व हैं कि वह अपने नागरिको को एक स्वच्छ, निष्पक्ष एवं भ्रष्टाचार से मुक्त राजस्व न्याय प्रणाली प्रदान करेंखनिज कारोबारियों को यह समझ लेना चाहिए, डम्पर मालिको को यह समझ लेना चाहिए कि राजस्व न्याय व्यवस्था से न्याय चाहिए तो उनको अदालत में केवल मुकदमा ही नहीं लड़ना हैं बल्कि राजस्व न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए भी अपने स्तर पर प्रयास करना पड़ेगा, व्यवस्था में प्रचलित गलत दोषसिद्धि को अस्वीकार करना पड़ेगा, एक आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा, झूठे मुकदमों और गलत दोषसिद्धि का विरोध तो करना पड़ेगा। मप्र राज्य सरकार ने खनिज नीति और नियम में कई ऐसे प्रावधान कर रखे हैं जो केवल खनिज कारोबारियों को केवल परेषान करने के लिए नौकरषाहों ने बना कर रखे हैं तो ऐसे नियम का भी विरोध करना पड़ेगा, राजस्व अदालतों के माध्यम से अवैध वसूली का विरोध तो करना पड़ेगा। विधायक, सांसद, मंत्री और सरकार को आदेष करें कि प्रदेष की जनता को स्वच्छ, निष्पक्ष, भ्रष्टाचार से मुक्त राजस्व न्याय प्रणाली प्रदान करें तथा पद एवं शक्ति का दुरूपयोग करने वाले गलत फैसला लिखने वाले नौकरषाहो को लोक सेवा के अयोग्य ठहराने का काम अवष्य ही करें। लोक तंत्र में परिवर्तन केवल तभी आता हैं जब आम जनता आवाज उठाती हैं। आवाज उठाईए और परिवर्तन लाईए।