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कोरोना दौर में जून के आखिर तक आतेआते स्टॉक मार्केट में हलकी-सी बढ़त देखने को मिली क्या अच्छे दिनों के संकेत हैं
August 28, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • मनोरंजन / व्यापार

आम आदमी की हमारी समझ उन लोगों तक सीमित है, जिनकी थोड़ी बहुत सेविंग्स है. लेकिन जो 80 फ़ीसदी लोग हैं, उनके सामने स्वास्थ्य और रोजगार की मुश्किलें हैं

मार्च का महीना शुरू ही हुआ था कि कोरोना महामारी ने भारत को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया. महीना ख़त्म होते-होते सरकार ने देशभर में लॉकडाउन लगा दिया. व्यवसाय, उत्पादन, कामकाज सभी ठप पड़ गए. मज़दूरों के सामूहिक पलायन ने स्थिति और बिगाड़ दी. उस वक्त स्टॉक मार्केट में अचानक तेज़ गिरावट आई और कयास ये लगाए जाने लगे कि देश के लिए आगे का रास्ता बेहद मुश्किल होने वाला है. लेकिन जून के आख़िर तक आते-आते स्टॉक मार्केट में हलकी-सी बढ़त देखने को मिली और उम्मीद जगी कि शायद अर्थव्यवस्था अब महामारी की मार से उबरने लगी है. लेकिन शुक्रवार को रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि स्टॉक मार्केट में जो बढ़त दिखाई दे रही है वो अर्थव्यवस्था के असल हालात से कोसों दूर है.

अर्थव्यवस्था का आईना नहीं शेयर बाज़ार अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा कहती हैं कि शेयर बाज़ार में उतार-चढ़ाव मुट्ठीभर अमीरों के लिए जुए जैसा है, इसे देश की पूरी अर्थव्यवस्था का आईना कहना गलत होगा. उनका ऐसा इसलिए मानना है, क्योंकि "एक सर्वे के अनुसार देश के 80 फीसदी लोग महीने में 10 हज़ार रुपए से कम कमाते हैं. लगभग 20 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिनके पास नौकरी का लिखित कॉन्ट्रॅट होता है. सिर्फ 17 फीसदी लोग नौकरीपेशा हैं. एक तिहाई लोग दिहाड़ी मज़दूर हैं, जबकि 47 फ़ीसदी वो लोग हैं, जो ख़ुद का काम करते हैं, इनमें सब्जी बेचने वाले से लेकर लोहार, कुम्हार, साइकिल ठीक करने वाले भी शामिल हैं." ये भी पढ़ें: भारत-चीन विवाद का कारोबार पर कितना असरवहीं अर्थशास्त्री और वित्त मंत्रालय की पूर्व प्रधान आर्थिक सलाहकार इला पटनायक कहती हैं कि शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था की आज की स्थिति नहीं दर्शाता.

“इसका एक और कारण ये है कि लोग ये भी देखते हैं कि वो कहाँ पैसा लगा सकते हैं. जब लोग बाज़ार में अधिक पैसा लगाते हैं, तो इससे बाज़ार में पैसा बढ़ता है जो शेयर बाज़ार में बढ़त के तौर पर दिखता है. इन दोनों फ़ैक्टर के मद्देनज़र ही हम अर्थव्यवस्था को समझने की कोशिश कर सकते हैं.”

अर्थव्यवस्था को लगातार तीसरी और गंभीर चोट देश की अर्थव्यवस्था के सामने कोरोना ने तीसरी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है. 2016 नवंबर में अर्थव्यवस्था ने नोटबंदी की कड़ी मार झेली, जब अचानक रातोंरात 500 और 1000 के नोटों का चलन बंद कर दिया गया. सरकार ने कहा कि ऐसा अर्थव्यवस्था में मौजूद जाली नोटों और काला धन और दो नंबर के पैसे पर कार्रवाई करने के लिए किया गया है. लेकिन कुछ महीनों बाद आई आरबीआई की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि चलन से हटाए गए नोटों का 99 फ़ीसदी वापस बैंकों में लौटकर आ गया है. यानी नकदी के रूप में मौजूद लगभग पूरा ही काला धन बैंकों में जमा करा दिया गया.

मौजूदा स्थिति में क्या हो सरकार की प्राथमिकता अर्थशास्त्री इला पटनायक कहती हैं कि शेयर मार्केट की मौजूदा स्थिति को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए. वो कहती हैं, “हम मान सकते हैं कि अर्थव्यवस्था के लिए जितने बड़े नेगेटिव शॉक की उम्मीद की जा रही थी. अभी वो उतना बडा नेगेटिव शॉक नहीं दिखता. कोरोना के शरुआती दौर में जिस तरह के डर और दहशत का माहौल था, वो अब कम हुआ है. आज हम जब देखते हैं, तो हम महामारी के पहले के मुक़ाबले उत्पादन के 70 फीसदी लेवल तक वापस आ रहे हैं." “रोज़गार के मौके तेज़ी से लौट रहे है. हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों को मिलने वाले पैसे कम हुए हैं. लेकिन फिर भी जैसा पहले सोचा जा रहा था कि बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी होगी, लोगों की मौतें होंगी, वैसी बुरी स्थिति अब नहीं है. “ वो कहती हैं, "कोरोना महामारी से पहले अर्थव्यवस्था में रिकवरी के निशान दिखने लगे थे, लेकिन कोरोना के कारण लगाए लॉकडाउन ने बहुत अधिक मुश्किलें पैदा कर दी. आज़ाद भारत की अर्थव्यवस्था ने कभी इतना बड़ी मुश्किल नहीं देखी थी. लेकिन हमारी स्थिति फ़िलहाल उतनी ख़राब नहीं है, जितना प्रेडिक्ट किया जा रहा था.”