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कोरोना संकट: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोरोना वायरस को गाँवों में नहीं फैलने देना है.
May 13, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • देश / विदेश

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोरोना वायरस को गाँवों में नहीं फैलने देना है. जिस भारत को गाँवों का देश कहा जाता है और जिसकी 66 फ़ीसदी आबादी गाँवों में रहती है, वहाँ के लिए कोरोना बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है.

समस्या मज़दूरों की जब श्रमिक ट्रेनों की शुरुआत हुई और एक मई को पहली ट्रेन झारखंड पहुँची, तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा भी था, "हम जानते हैं कि अपने लोगों के साथ हम कोरोना को भी ला रहे हैं." शनिवार को बिहार सरकार के स्वास्थ्य सचिव लेकेश सिंह ने भी कहा कि 21 जिलों में कम से कम 96 प्रवासी मज़दूर कोरोना संक्रमित मिले हैं. प्रशासन के मुताबिक़, इनमें से कई यो मज़दूर हैं जो पैदल ही अपने गृह क्षेत्रों में आए.

भारत में कितने गाँव सरकार की लोकल गवर्नमेंट डायरेक्ट्री के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 6 लाख 62 हज़ार 599 गाँव हैं. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा एक लाख 7 हज़ार 242 गाँव हैं. उसके बाद मध्य प्रदेश में 55580, ओडिशा में 52141, राजस्थान में 46572, बिहार में 45447, महाराष्ट्र में 44137, कर्नाटक में 33157, छत्तीसगढ़ में 20613 गाँव हैं. हालांकि संजय कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इसके बावजूद गाँव में ज़्यादा बड़ी चुनौती इसलिए है क्योंकि शहरों में लोग सेंसिटाइज़ेशन की बात को ज़्यादा अच्छे से समझ पा रहे हैं. "इसमें शिक्षा की भी एक भूमिका है. चाहे सोशल डिस्टैंसिंग की बात हो, हाथ धोने की बात हो, मास्क पहनने की बात हो, अगर गाँवों और शहरों की तुलना करें तो इस मामले में गाँव कहीं पिछड़ा हुआ दिखाई पड़ेगा." इसके अलावा उनके मुताबिक, हाइ-रिस्क ग्रुप पर खास तौर पर निगरानी रखी जा रही है, जिनमें बुजुर्ग और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग शामिल हैं. उन लोगों में अगर लक्षण दिखते हैं तो उन्हें तुरंत डेडिकेटेड सेंटर में ले जाया जाएगा और वहां उनके सैंपल लेने की सुविधा की जाएगी. गांवों में बुजुर्ग ज़्यादा, इसलिए कोरोना का ख़तरा ज़्यादा ग्रामीण भारत में कोरोना का ज़्यादा खतरा इसलिए भी है, क्योंकि यहां शहरों के मुकाबले रहने वाले बुजुर्ग या 60 से ज़्यादा उम के लोगों की संख्या ज़्यादा है.

पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रामीण भारत के लिए कोरोना वायरस कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है, ये समझने के लिए ग्रामीण भारत के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी नज़र दौड़ानी होगी. नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2019 में जारी किए गए आँकड़ों को देखें तो पाएंगे कि देश में करीब 26,000 सरकारी हॉस्पिटल हैं. इनमें से ज़्यादातर 21,000 ग्रामीण इलाकों में हैं. आँकड़ों की ये तस्वीर देखने पर तो राहतभरी लग सकती है, लेकिन सच्चाई ये है कि मरीज़ और उपलब्ध बेडों की संख्या का अनुपात बेहद चिंताजनक है.

बिहार की हालत सबसे ख़राब अगर हर राज्य की आबादी के हिसाब से बेड़ों की संख्या की तुलना करें तो बिहार की हालत सबसे खराब नज़र आती है. तमिलनाडु इस मामले में सबसे अच्छी स्थिति में है. राज्य के ग्रामीण इलाकों में कुल 40,179 बैड हैं और कुल 690 सरकारी हॉस्पिटल हैं. इन आँकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु में हर बेड पर करीब 800 मरीज़ हैं.

गांवों में डॉक्टर कितने हैं? रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक, ग्रामीण भारत में हर 26,000 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर मौजूद है. जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के नियम के मुताबिक, डॉक्टर और मरीज़ों का यह अनुपात हर 1,000 मरीज़ पर 1 डॉक्टर का होना चाहिए. राज्यों की मेडिकल काउंसिलों और मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एमसीआई) के यहां रजिस्टर्ड एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या करीब 1.1 करोड़ है.

आशा वर्कर कोरोना संकट के इस दौर में ग्रामीण भारत के अंदर आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका काफ़ी अहम है. उन्हें अपने-अपने ग्रमीण इलाक़ों की सेहत मॉनिटर करने का काम सौंपा गया है. आशा कार्यकर्ता नियमित रूप से 100 घरों तक में जाती हैं और लोगों की स्वास्थ्य जानकारी इकट्ठा करती हैं और कोविड-19 के मामले या संदिग्ध मामले के बारे में राज्य को

क्रिटिकल केयर 'जीरो' संक्रमित व्यक्ति की हालत अगर गंभीर हो जाती है तो उसे क्रिटिकल केयर यानी आईसीयू की ज़रूरत पड़ेगी. तो ग्रामीण भारत में क्रिटिकल केयर की क्या सुविधा है? इसके जवाब में इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर के अध्यक्ष ध्रुव चौधरी कहते हैं कि इसका एक शब्द में जवाब है- 'जीरो'. उनके मुताबिक़, देश में जितने पेंटिलेटर मौजूद हैं. उनमें से अधिकतर मेट्रो शहरों, मेडिकल कॉलेजों और प्राइवेट अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं. वो कहते हैं कि ऑक्सीजन स्पलाई की सीएचई यानी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में व्यवस्था करनी पड़ेगी. साथ ही पास के छोटे शहरों में स्थित प्राइवेट अस्पतालों में भी व्यवस्था करनी होगी. रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़ देशभर में 5335 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र औसतन 120 गाँवों या कहें कि क़रीब 560 स्क्वायर किलोमीटर के ग्रामीण इलाक़े को कवर करता है.