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कोरोना वायरस: कोविड-19 महामारी से बचने के लिए ओसीडी वाले लोग कम परेशानी में
May 11, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • देश / विदेश

पीटर गोफ़िन के लिए सारी जिंदगी कीटाणुओं से डर के साये में जीने का मतलब कोरोना वायरस महामारी के लिए तैयार रहना था. वो जानते थे कि किस तरह से हाइजीन के नियमों को मानना है और उनके पास अपनी बेचैनी को बेलगाम होने से रोकने के लिए ज़रूरी स्किल भी था.

ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की चुनौतियां? अपनी टीनेज के दौरान मैं ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) बीमारी से पीड़ित पाया गया था. जिंदगी के करीब दो-तिहाई हिस्से में मैं जर्स से परेशान रहा. मैं सोचता था कि ये किस तरह से ट्रांसफ़र होते हैं और मैं इनसे किस तरह से बच सकता हूं. इसी वजह से आज पूरी दुनिया को जिस तरह की सावधानियां अपनाने के लिए कहा जा रहा है मैं उनमें सबसे आगे था.

संदेह का चरम 19वीं सदी के मध्य में, फ्रांसीसी डॉक्टरों ने ओसीडी पर शुरुआती अध्ययनों के बारे में लिखना शुरू किया. उन्होंने इसे ला फ़ोली इ डोउते यानी पागलपन की हद तक शक नाम दिया. मेरे सबसे ख़राब लमहों के लिए मैं इसे सबसे बढ़िया परिभाषा मानता है. इस महामारी के दौर में हम में से कई ऐसे ही हालात का फ़िलहाल सामना कर रहे हैं.

कुछ भी छूने से डरना मैं कनाडा में पला-बढ़ा. मुझे कम उम्र से ही चिंता और इर की समस्या होने लगी थी. जब तक मैं 12 साल का हुआ, ये चीजें सिमटकर मोटे तौर पर सफ़ाई और संक्रमण पर सीमित हो गई. बाद में मेरे परिवार ने नोटिस किया कि मैं दरवाज़ों के हैंडल, लाइट स्विच जैसी चीजें छूने से बचता हूं और मैं लाल हो जाने तक अपने हाथ धोता हूं.पिछले करीब 5 साल से मेरी ज़्यादातर ओसीडी एंग्जाइटी कंट्रोल में रही है. मैं अपने डर से लड़ने और इससे बाहर निकलने को लेकर ज़्यादा सतर्क हो गया हूं. मुझे अपने पार्टनर से भी बहुत मदद मिली है जो कि बेहद धैर्यवान है और मुझे समझती है.

ओसीडी वाले लोग कम परेशानी में आश्चर्यजनक रूप से, पहले से एंग्जाइटी का सामना कर रहे या जर्म इश्यू से जूझ रहे लोगों ने कहा है कि वे इस महामारी के दौरान कम परेशानी महसूस कर रहे हैं. ऐसा शायद इस वजह से है क्योंकि दुनिया ने उनके नज़रिये को अपना लिया है. लोग अब उन्हीं की तरह सतर्कता बरत रहे हैं और रोज़ाना ज़्यादा तनाव का सामना कर रहे हैं. यह मेरे लिए कुछ हद तक सत्य है. लेकिन, महामारी ने मेरे लिए कुछ अनोखी चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं. पब्लिक हेल्थ वॉर्निंग्स से यह चीज़ साबित हो रही है कि जर्स आसानी से एक शख़्स से दूसरे शख़्स में ट्रांसफ़र हो सकते हैं. यहां तक कि हमारी गलियों में एक दूसरे के पास से गुज़रने से भी ऐसा हो सकता है. इस काउंसलिंग का मक़सद मरीजों को ऐसी स्किल देना है ताकि वे ऐसे विचारों या एक्शंस को पहचान सकें, चैलेंज कर सकें और इन्हें रिप्लेस कर सकें जो कि तार्किक या मददगार नहीं हैं. किसी प्रोफेशनल काउंसलर की मदद से सीबीटी को सीखना सबसे अच्छा होता है. लेकिन, इस तकनीक के कुछ ऐसे तत्व भी हैं जिन्हें आप खुद से भी कर सकते हैं और ये किसी के लिए भी मददगार साबित हो सकता है.

अपनी प्रॉब्लम्स से निबटने के तरीके निकालें लॉकडाउन में रह रहे लोगों के लिए एंग्जाइटी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, इनकम या जॉब सिक्योरिटी ख़त्म होने, सोशल आइसोलेशन और जीवन के खुशनुमा पहलुओं के ख़त्म होने का जटिल मिला-जुला रूप हो सकता है. इन सभी चिंताओं को व्यक्तिगत रूप से पहचानने के ज़रिए आप कुछ मसलों को कम करने का फैसला कर सकते हैं. मसलन, आप आइसोलेशन से लड़ने के लिए परिवार या दोस्तों के साथ नियमित रूप से वीडियो कॉल्स कर सकते हैं. या आप दुनिया के फिर से खुलने के बाद एक बड़ी छुट्टी या पार्टी की योजना बना सकते हैं. हम शायद खुद को आइसोलेट कर इस संकट से उबरना चाहते हैं. लेकिन, हम सब साथ मिलकर ऐसा कर रहे हैं.