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कोविड-19: नाकामियों का ठीकरा राज्यों के माथे फोड़ने की तैयारी...?
May 25, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • सम्पादकीय

 उमेश त्रिवेदी - लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। - साभार दैनिक सुबह सवेरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का नारा लगाने के बाद नोटबंदी की तरह ही कोविड-19 को भी समय के हवाले कर दिया है। आत्मनिर्भर भारत का चमत्कारिक उद्घोष ढोल बजाते हुए विपदाओं के आर्तनाद के आगे-आगे चलने लगा है। कोरोना की बदौलत पसरी गरीबी, बेबसी, भूख, लाचारी और बेरोजगारी की डरावनी तस्वीर के साथ ही आत्मनिर्भरता के निर्माण के लिए 20 लाख करोड़ की फटी पोटली जरूर उसके पास है। केन्द्र सरकार की मनोदशा लॉकडाउन-4 की घोषणाओं और अधिसूचनाओं में परिलक्षित हो रही है। इनमें कहा गया है कि राज्य सरकारें खुद के बलबूते पर महामारी से निपटने का इंतजाम करें...जनता का इलाज करें..। केन्द्र तुरत-फुरत व्यवस्थाओं का सामान्यीकरण चाहता है, ताकि हवाई जहाज उड़ने लगें, ट्रेने चलने लगें, ट्रक दौड़ने लगें...आदि-आदि। राजनीति में समय बड़ा बलवान होता है। जनता की याद्दाश्त भी अल्पजीवी होती है। इस थीसिस के मद्देनजर नोटबंदी की नाकामियों की तरह ही समय का मरहम कोविड-19 के घावों को भी ढक लेगा। नोटबंदी के तथ्य बताते हैं कि सरकार नोटबंदी के लक्षित उद्देश्यों को हासिल नहीं कर पाई थी। आज तक यह खुलासा नहीं हो सका है कि नोटबंदी देश के लिए कितनी लाभदायक रही अथवा कितना नुकसान हुआ? नोटबंदी की सभी कसौटियों पर लगभग असफल सिद्ध होने के बाद भी भाजपा ने कई महत्वपूर्ण चुनाव जीत लिए थे। भाजपा इस जीत को ही नोटबंदी की सफलता का पैमाना मानती है। राजनीति में राजनेताओं के नफे-नुकसान का हिसाब तो तत्काल सामने आ जाता है, लेकिन उनके नीतिगत फैसलों और कारनामों से होने वाले नुकसान का आकलन कदाचित ही हो पाता है? नोटबंदी के वक्त मोदी ने झोली फैलाते हुए नोटबंदी के उद्देश्योें को हासिल करने के लिए पचास दिन का वक्त मांगा था। कालाधन, आतंकवाद और कालाबाजारी जैसी समस्याएं आज भी उस अनुपात में मौजूद हैं। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए पहले लॉकडाउन के समय मोदीजी ने एक भावुक अपील में इक्कीस दिन का वक्त मांगा था। दो माह से ज्यादा वक्त लॉकडाउन में गुजारने के बावजूद कोरोना का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। कोरोना से निपटने के मोदी सरकार के तौर-तरीकों पर कई विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। प्रवासी मजदूरों की भूख और पलायन के बीच मोदी सरकार कोरोना महामारी को इवेंट की तरह ट्रीट कर रही है। कोरोना की चीत्कारों के बीच भी मोदी की लोकप्रियता के प्रायोजित सर्वेक्षणों का सिलसिला जारी है। मार्च-अप्रैल में सबसे पहले ’सी-वोटर’ ने सर्वेक्षण करके मोदी को लोकप्रियता का प्रमाण-पत्र दिया था। ’मॉर्निंग कंसल्ट’ नाम की अल्पज्ञात अमेरिकी एजेंसी ने भी मोदी की लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल देखा है। उसके अनुसार जनवरी 2020 में 76 प्रतिशत लोगों की पसंद मोदीजी कोरोना संकट के बाद अप्रैल 20 में 83 प्रतिशत लोगों की पसंद बन गए थे। सड़क पर भूख से बिलबिलाते लाखों प्रवासी मजदूरों के हुजूम के बीच मोदी की लोकप्रियता में यह उछाल चौंकाता है कि इस वक्त कौन सी एजेंसी को ऐसे सर्वे करने की जरूरत महसूस हो रही है? लोकप्रियता के आत्ममुग्ध सर्वेक्षणों के बीच विशेषज्ञ मानते हैं कि कोरोना से निपटने में मोदी सरकार ने गंभीर भूलें की हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार और अर्थशास्त्री रामचंद्र गुहा का कहना है, ’यदि प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा से पहले प्रवासी मजदूरों को घर जाने के लिए कम से कम एक सप्ताह का वक्त दिया होता तो भारत में विभाजन के बाद सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी से बचा जा सकता था। लॉकडाउन ने लाखों मजदूरों की जिंदगी को दुश्‍वार कर दिया है। इसके सामाजिक और मानसिक नतीजे भुगतना पड़ेगें’। पता नहीं, प्रधानमंत्री ने लोगों से मशविरा किया था या नहीं अथवा खुद उन्होंने ऐसे किया...। यदि मोदी विपक्ष से सुझाव लें तो स्थिति को संभाला जा सकता है, लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे...। इस त्रासदी को केन्द्र सरकार ने पैदा किया है। दुर्भाग्य से अब वो इसका ठीकरा राज्यों के सिर पर फोड़ने लगे हैं। राज्यों के सिर पर ठीकरा फोड़ने के रामचन्द्र गुहा के आरोपो में दम है। वैसे भी गैर एनडीए राज्य सरकारों से मोदी सरकार के रिश्ते अधिकांशत: सामान्य नहीं रहे हैं। कोरोना संकट और लॉकडाउन के दरम्यान केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, बंगाल, राजस्थान जैसे गैर-एनडीए राज्यों और मोदी सरकार के बीच सीधे तनाव के कई मामले सामने आए हैं। मोदी सरकार द्वारा केन्द्र और राज्यों के बीच समन्वय के लिए गठित अंतराज्यीय परिषद की अवहेलना जगजाहिर है। 2017 के बाद इसकी एक भी बैठक नहीं हो पाई है। लॉकडाउन में राजस्व वसूली स्थगित होने के कारण राज्यों की आर्थिक स्थिति छिन्न-भिन्न हो चुकी है। मोदी सरकार एनडीए और गैर-एनडीए शासित राज्यों के हिस्से की राशि देने में ही सौतेला व्यवहार कर रही है। लॉकडाउन ने राज्यों की अपनी राजस्व वसूली की कमर तोड़ दी है। केन्द्र और राज्य के बीच तल्ख रिश्तों का यह दौर कहीं कोरोना के कहर को लोकतंत्र के लिए कयामत में तब्दील ना कर दे...।