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मजदूरों की दुर्दशा करने वाले देश… अब तेरा भगवान ही मालिक है* *विनीत श्रीवास्तव की कलम से...
May 25, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • सम्पादकीय

*मजदूरों की दुर्दशा करने वाले देश… अब तेरा भगवान ही मालिक है* *विनीत श्रीवास्तव की कलम से......* जल्दबाजी में देश के अंदर लॉकडाउन का फैसला । ..... सरकार के द्वारा चंद घंटों में 1 अरब 30 करोड़ लोगों को कोरोना वायरस से बचाने के लिए लिया गया था ये फैसला। लेकिन क्या असलियत में 1 अरब 30 करोड़ लोग देश में सुरक्षित हैं कोरोना वायरस से। तो फिर संक्रमण काल में करोड़ों मजदूर क्यों हैं सड़को पर, भारत में कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन को आज लगभग 2 महीने हो गए। इन 60 दिनों में भारत ने कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 1 लाख से ऊपर होती देखी। लोग अपने घरों में सुरक्षित रहें, इसलिए सरकार ने देश में लॉकडाउन लगा दिया। सरकार ने दावा किया कि उसने भारत के लोगों को कोरोना के प्रति लड़ना सिखाया और कहीं ना कहीं भारत में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या को कम करके दिखाया। भारत सरकार कोरोना के प्रति अपनी जवाबदेही को पूरा करते हुए बोलती नजर आई। लेकिन क्या यह सही है ? भारत सरकार जहां एक और पूरी शिद्दत के साथ कोरोना वायरस से लड़ती हुई नजर आती है तो वहीं देश के लगभग 15 करोड़ प्रवासी मजदूरों को उनके हालात पर ही छोड़ती हुई भी नजर आई। पूरे देश में सड़कों पर, हाईवे पर अब मजदूरों के घर वापसी के दृश्य आम हो गए, पैरों में छाले लिए, भूखे पेट मजदूर हजारों किलोमीटर बेबस लाचार होकर अपने घरों की तरफ पैदल ही निकल गए, कई मजदूर तो अपने घर के रास्ते में ही दम तोड़ते हुए भी नजर आए। पर सरकार का रवैया इनके प्रति वैसा ही रहा। जिन कंधों पर देश का आधार टिका हुआ है, जिन हाथों में देश का उत्पादन छुपा हुआ है, जिनकी मेहनत ने शहरों को तैयार किया उनको सही सलामत घर भेजने की बजाय सरकार को उन लोगों को लाने की जल्दबाजी रही जो भारत को छोड़कर विदेशों में जा बसे थे। तभी तो मजदूरों के घर वापसी के लिए बसों और ट्रेनों की व्यवस्था शुरू कराने से पहले देश की सरकार ने विदेशियों को देश में लाने के लिए के लिए जो अब भारत के लिए काम नहीं करते हवाई जहाज से लेकर पानी के जहाज तक भेज दिए। नंगे पांव, भूखे पेट, जेब में पैसा नहीं, खाने के लिए अन्न नहीं, रहने के लिए छत नहीं, काम करने के लिए रोजगार नहीं, जहां रहते थे वहां से निकाल दिए गए, जहां काम करते थे वहां से मना कर दिया गया, क्या करते यह बेबस मजदूर, किसके भरोसे रहते महानगरों में, बेबसी का आलम देखिए कि अपने दुधमुहे बच्चे को, बुजुर्ग माता-पिता को साथ लेकर हजारों किलोमीटर की यात्रा पर घर की वापसी के लिए यह मजदूर निकल पड़े, पता भी नहीं कि इनका सफर पूरा होगा या नहीं । लेकिन क्या करें, मरते क्या ना करते, मजदूर अब सिर्फ घर पहुंचना चाहता है। आखिर कोई तो होगा घर पर जो अपना होगा। विडंबना देखिए इन मजदूरों को तो यह भी नहीं पता की रोजी रोटी और पेट भरने की जिस आस में वह गांव छोड़कर शहर की ओर आए थे आज उसी शहर से जिस गांव की ओर लौट रहे हैं । वहां इन्हें रहने को जगह या खाने को खाना मिलेगा या नहीं कुछ पता नहीं। लेकिन फिर भी एक आस बाकी है कि इन बड़े-बड़े महानगरों में जहां ना इनका मालिक हुआ, ना ही इनका मकान मालिक हुआ और ना ही सरकार इनकी हुई वहीँ इनका गांव इन्हें फिर से एक बार आसरा देगा। प्रश्न यह है कि, आखिर यह मजदूर गांव जाकर अपनी रोजी रोटी के लिए क्या करेंगे, कहां से इतना रुपया कमा पाएंगे या क्या काम करेंगे कि दो वक्त की रोटी इन्हें इनके गांव में मिल सके। सरकार भी इन लोगों के लिए कुछ नहीं कर रही है, ना ही आने वाले समय में इनके लिए कोई रोजगार की व्यवस्था कर रही है और ना ही पर्याप्त खाने पीने की व्यवस्था कर रही है। मजदूर अब अकेला सड़कों पर घरों के लिए वापसी कर चुका है । लेकिन एक बात तो तय है कि यह मजदूर अब लौटकर फिर से शहरों की तरफ नहीं आएंगे । और अगर आएंगे भी तो भरोसा साथ में लेकर नहीं आएंगे । क्योंकि मजदूर अब जान चुका है की यह शहरी रिश्ते सिर्फ मतलब के हैं। रात 8:00 बजे टीवी पर आकर फैसला सुनाने से कुछ नहीं होता। हर बार हर फैसला सही निशाने पर नहीं लगता। इस बार का लॉकडाउन का फैसला भले ही कोरोना वायरस की रफ्तार को धीमा करने में सफल हो गया लेकिन कोरोना वायरस को खत्म नहीं कर पाया । वहीँ सरकार के इस फैसले से कई मजदूरों की जिंदगी खत्म हो गई, करोड़ों मजदूरों की नौकरियां चली गई, उनका रोजगार छिन गया, दिहाड़ी मजदूर तो पूरी तरह से बर्बाद हो गया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्वरोजगार से जुड़े प्लंबर, मैकेनिक, रेहड़ी लगाने वाले, फल सब्जी विक्रेता, नाई, धोबी, रिक्शा चलाने वाले, कूड़ा बीनने वाले, इनके पास पिछले 2 महीनों से कोई काम बचा ही नहीं । रोज कमा कर अपना पेट भरने वाले यह मजदूर आज दानदाताओं और समाजसेवी संगठनों के द्वारा दिए जा रहे है राशन पर आश्रित हो गए। आखिर सरकार इनकी सुध क्यों नहीं लेती ?, कब सरकार इनके लिए कुछ करेंगी ?, कब तक यह लोग बेबसी की जिंदगी जीते रहेंगे ? । एक बात और ध्यान देने वाली है कि विश्व के किसी भी देश में लॉकडाउन होने के बाद इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों की रोजी-रोटी पर खतरा उत्पन्न नहीं हुआ है जितना कि भारत में हुआ है। सरकार को चाहिए कि इन मजदूरों में अब आत्मविश्वास पैदा करें, उनकी रोजी-रोटी की दिक्कतों को दूर करें, उन्हें बेहतर स्वास्थ्य और खाने की व्यवस्था दें, तभी यह मजदूर फिर से अपने काम पर लौट पाएंगे और भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दे पाएंगे अन्यथा अब देश का भगवान ही मालिक है।