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मप्र कांगे्रस कमेटी मुख्यमंत्री से जानना चाहती है कि क्या उन्होंने इंदिरा गृह ज्योति योजना को समाप्त कर बिजली के लिए संबल योजना पुनः प्रारंभ करने की तैयारी के कोई मौखिक निर्देश दिये हैं? -अभय दुबे
June 22, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • मध्यप्रदेश

, भोपाल -

अखिल भारतीय कांगे्रस मीडिया विभाग के कोर्डिनेटर अभय दुबे ने एक पत्रकार वार्ता के माध्यम से बताया कि आज मप्र के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चैहान बिजली उपभोक्ताओं से चर्चा करने वाले हैं। मप्र कांगे्रस कमेटी मुख्यमंत्री से जानना चाहती है कि क्या उन्होंने इंदिरा गृह ज्योति योजना को समाप्त कर बिजली के लिए संबल योजना पुनः प्रारंभ करने की तैयारी के कोई मौखिक निर्देश दिये हैं? मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने प्रदेश के नागरिकों को राहत देते हुए एक क्रांतिकारी इंदिरा गृह ज्योति योजना लागू की थी। श्री शिवराजसिंह चैहान द्वारा चलायी जा रही संबल योजना और इंदिरा गृह ज्योति योजना के बीच तुलना करना बेहद जरूरी है, क्योंकि भाजपा सरकार इंदिरा गृह ज्योति योजना को समाप्त करने का मानस बना रही है। संबल योजना:- भाजपा की तत्कालीन सरकार ने एक किलोवाट के घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं को 200 रूपये प्रति माह निर्धारित कर संबल योजना लागू की थी। इस योजना के तहत लगभग 58 लाख परिवार 200 रूपये माह में बिजली का उपभोग कर रहे थे। इंदिरा गृह ज्योति योजना:- इंदिरा गृह ज्योति योजना के तहत मप्र के प्रत्येक बिजली उपभोक्ता, जिनकी प्रतिमाह बिजली 150 यूनिट तक खर्च होती है, उन्हें 100 यूनिट पर मात्र 100 रूपये बिजली का बिल देना होता है। इस योजना के तहत एक करोड़ पंाच लाख घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को लाभ दिया जा रहा था। तो जहां एक तरफ लगभग 90 प्रतिशत घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को इंदिरा गृह ज्योति योजना में लाभ मिलता है, वहीं संबल योजना मंे केवल 50 प्रतिशत उपभोक्ताओं को ही लाभ दिया जा रहा था। वर्तमान में मप्र में लगभग एक करोड़ 20 लाख घरेलू बिजली उपभोक्ता हैं, जिनमें से 87 लाख उपभोक्ता 100 यूनिट के अंदर बिजली खर्च करते हैं, अर्थात इंदिरा गृह ज्योति योजना में इन परिवारों का बिजली का बिल मात्र 100 रूपये महीना या उससे कम आता है। वहीं संबल योजना के तहत इन उपभोक्ताओं का आंकलन करें तो उन्हें दोगुनी राशि अर्थात 200 रूपये महीने बिजली बिल भरना होगा। वहीं 18 लाख घरेलू बिजली उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनकी बिजली की खपत 100 से 150 यूनिट प्रतिमाह होती है अर्थात इंदिरा गृह ज्योति योजना के तहत कुल एक करोड़ पांच लाख परिवार इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। मध्यप्रदेश नियामक आयोग का मूल्यांकन कहता है कि 0.1 किलोवाट के कनेक्शन पर प्रतिमाह 15 यूनिट का खर्च आता है अर्थात 01 किलोवाट के कनेक्शन पर अधिकतम 150 यूनिट प्रतिमाह बिजली खर्च होने की संभावना रहती है अर्थात यह स्पष्ट है कि अब यदि वर्तमान भाजपा सरकार इंदिरा गृह ज्योति योजना को बंद करती है तो यह मप्र के नागरिकों के साथ कुठाराघात होगा। आज भी प्रदेश के नागरिकों को जब हजारों रूपये के बिजली बिल थमाये जा रहे हैं तो उन्हें कमलनाथ सरकार की याद आ रही है। पांच लाख उपभोक्ता इंदिरा गृह ज्योति योजना से बाहर:- भाजपा सरकार ने अप्रैल माह के घरेलू बिजली बिल का मूल्यांकन पिछले वर्ष के आधार पर किया है, जिसमें पूर्व क्षत्र विद्युत वितरण कंपनी के तहत लगभग 38 लाख 94 हजार विद्युत उपभोक्ताओं को मध्यक्षेत्र भोपाल 39 लाख उपभोक्ताओं को और इंदौर में लगभग 31 लाख 71 हजार उपभोक्ताओं को इंदिरा गृह ज्योति योजना के दायरे में रखा है। अन्नदाता को कांगे्रस ने दी थी देश की सबसे सस्ती दर की बिजली:- श्री कमलनाथ जी की मान्यता है कि प्रदेश का अन्नदाता किसान ही सही मायने में प्रदेश की प्रगति का कर्णधार है। उन्होंने सरकार में आते ही दस हाॅर्स पाॅवर तक के कृषि पंप उपभोक्ताओं की विद्युत दरों को आधा कर दिया था। पूर्ववर्ती सरकार में जो 1400 रूपये प्रति हाॅर्स पाॅवर, प्रतिवर्ष कृषि पंपों की विद्युत दर निर्धारित थी, उसे हमने एकदम आधा करके 700 रूपये प्रति हाॅर्स पाॅवर प्रतिवर्ष कर दिया था। इससे 19.91 लाख किसान लाभान्वित हो रहे थे। इस योजना के तहत प्रति किसान उपभोक्ता को लगभग 47 हजार रूपये प्रति वर्ष सब्सिडी की राहत प्रदान की जा रही थी। इतना ही नहीं, हमने स्थायी कृषि पंप कनेक्शन के अतिरिक्त अस्थायी कृषि पंप उपभोक्ताओं की विद्युत दर पूर्व की भाजपा सरकार की तुलना में कम की थी। ग्रामीण क्षेत्र में तीन माह के अस्थायी कृषि पंप कनेक्शन हेतु तुलनात्मक दरें निम्नानुसार हैं:- कृषि पंप (एच.पी.) वर्ष 2018 (भाजपा सरकार के समय की दर) वर्ष 2019-20 (हमारी सरकार के समय की दर 3 एच.पी. 7959 रू. 4654 रू. 5 एच.पी. 13128 रू. 7620 रू. 7.5 एच.पी. 20881 रू. 12069 रू. 10 एच.पी. 26050 रू. 15035 रू. छोटा किसान-निःशुल्क बिजली का योगदान:- एक हेक्टेयर तक की भूमि वाले अनुसूचित जाति/ जनजाति वर्ग के कृषकों को 5 हार्सपाॅवर तक के कृषि पंप कनेक्शनों हेतु निःशुल्क बिजली की व्यवस्था की थी। महामारी की दशा में भी पेट्रोल-डीजल की महंगाई की मार:- दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के आम नागरिक कोरोना महामारी और लाॅकडाउन की वजह से भीषणतम आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं और मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ाकर देश के नागरिकों को महंगाई के आग में झोंक रही है। इस पर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने गहरी चिंता व्यक्त की है। मोदी सरकार ने पिछले 16 दिनों में पेट्रोल में 9.60 रूपये और डीजल की कीमतों में 10.06 रूपये की वृद्धि की है, 6 जून को पेट्रोल 77.56 रूपये प्रतिलीटर था जिसे 22 जून, 2020 को 87.16 रूपये कर दिया गया तथा डीजल इसी दौरान 68.27 रूपये प्रति लीटर था उसे 78.33 रूपये प्रति लीटर कर दिया गया। मोदी सरकार जब सत्ता में आयी थी तो पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुक्ल केवल 19.20 रूपये प्रति लीटर और 3.16 रूपये प्रतिलीटर था, पिछले छह साल में लगभग 24 रूपये डीजल पर और 29 रूपये प्रतिलीटर उत्पाद शुक्ल में बढोत्तरी की, जो यूपीए सरकार की तुलना में क्रमशः 258 और 820 प्रतिशत ज्यादा है। इन छह वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने लगभग 18 लाख करोड़ रूपये जनता की जेब से निकाल लिये है। गौरतलब है कि 26 मई, 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभाली थी, तब भारत की तेल कंपनियों को कच्चा तेल 108 अमेरिकी डाॅलर प्रति बैरल मिल रहा था जो कि तत्कालीन डाॅलर रूपये के अंतर्राष्ट्रीय भाव के अनुसार 6330 रूपये प्रति बैरल होता था अर्थात लगभग 40 रूपये प्रति लीटर पड़ रहा था। जून 2020 में कच्चे तेल का अंतर्राष्ट्रीय भाव 40 अमेरिकी डाॅलर प्रति बैरल था। जो कि डाॅलर रूपये भाव के अनुसार 3038.64 रूपये प्रति बैरल होता है। यानि कुल 20 रूपये प्रति लीटर से भी कम। आज जो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत है लगभग उतनी कीमत 2004 में थी। तब पेट्रोल 36.81 रूपये प्रति लीटर और डीजल 24.16 रूपये प्रति लीटर था। याद कीजिए, जब वर्ष 2017 में मोदी सरकार ने एडमिनिस्टेªटिव फ्यूल प्राईजिंग मेकेनिजम के बजाय रोज भाव निर्धारित करने वाली डायनाॅमिक फ्यूल प्राईजिंग प्रणाली लागू की थी, तब मोदी सरकार ने यह तर्क दिया था कि रोज भाव इसलिए तय किये जा रहे हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में थोड़ा-बहुत भी कच्चे तेल का भाव कम होता है तो उसका सीधा लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा। मगर कथनी-करनी के अंतर के लिए प्रसिद्ध मोदी सरकार ने इस व्यवस्था को नागरिकों की जेब पर डांके की योजना में बदल दिया।