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रामनाम महाराज के प्रथम बीजाक्षर रकार की, जो अग्नि की भी अग्नि का हेतु है।
June 29, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • अध्यात्म

अप्रकट रूप से जो अग्नि हैं वो हमें जला नहीं सकतीहमारा जीवन, भी, प्रज्वलित अग्नि सा हैजैसे दीपक जला ,जब तक जला तब तक हम संसार को और संसार हमको देखता है।

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॥ नाम राम कथा 267 ॥ रामनामाकंनाय नमः हम चर्चा कर रहे थे, रामनाम महाराज के प्रथम बीजाक्षर रकार की, जो अग्नि की भी अग्नि का हेतु है। आज हम रकार के साथ अकार का भी वर्णन कर लेते हैंरकार अग्नि का हेतु हैं, और अग्नि के दोनो रूपों को हमने जाना, प्रकट,और अप्रकट,। प्रकट अग्नि हमें सबको, सहज ही अनुभव कराती है।, जला कर,ताप देकर,,शर्दि भगाकर, भोजन पकाने में, सब रूपों सेइस अग्नि का मुख्य कार्य है जलाना,यह सारे संसार को जला कर राख कर देगी। यह शक्ति इसमें सदैव विद्यमान हैं, पर प्रकट होने पर। अप्रकट रूप से जो अग्नि हैं वो हमें जला नहीं सकतीहमारा जीवन, भी, प्रज्वलित अग्नि सा हैजैसे दीपक जला ,जब तक जला तब तक हम संसार को और संसार हमको देखता है।, जब तक यह जो अग्नि हमारे दीपक की ज्योति के रूप में है तब तक हम जगत में लीला कर भी सकते है,और जगत में हो रही लीला को देख भी सकते हैं यहाँ अग्नि के दो नाना रूप हैं एक ज्योति जिससे हम अर्थात हमारा शरीर पैदा हुआऔर दुसरी ज्योति जो कि हम स्वयं हैवो अंतरकी ज्योति है।

दोनो अग्नि दोनो तरह की ज्योति अपने अप्रकट रूप में एक ही हैं, प्रकट रूप में भिन्न भिन्न विषयात्मक होकर भासती हैं विद्युत ,बीजली, एक होकर भी जैसे देह मिलती हैं उसके अनुसार कार्य करती हैंपंखों में वो हवा फेंकती है तो बल्ब में वो रोशनी देती हैं, तो माइक में वो आवाज को बूलंद करती हैं, तो गाडियों में वो दोडाती है। पर बीजली एक ही है। अब हम शरीर की बात कर लें। नाना रूपों में शरीर धारण किये,चेतन ज्योति देहानुसार कार्य करती हैं, नाना योनियों में, नाना प्रकार के कार्यउनमें से मानवीय शरीर में उस जीवन ज्योति के कार्य सर्वोत्तम है। मानव जीवन समस्त योनियों से उच्चतर हैं, यहाँ उस ज्योति को जाना पहचाना और अनुभव किया जा सकना संभव है। यह मानव जीवन की विशेषता है। अब मानव जीवन में हम अपनी अकेले की बात करेंमैं और मैरा शरीर, यह दो प्रकार हैमैं हैं और शरीर नहीं तो , कार्य करने की शक्ति शरीर में रहेगी नहीं बल्ब हैं और बीजली नहीं आ रही तो क्या बल्ब जलेगा ? अच्छा बिजली हैं पर बल्ब नहीं लगा तो ? रोशनी नहीं होगी।

तो शरीर भी हों और उसमें ज्योति भी हों, तो जगत भी प्रकट होजाता हैऔर जगत को देखने वाला भी। अब यह जो जगत हैं यह दृश्य हैं और हम जो हैं हम देखने वाले हुए। हम किस किस को देख सकते हैं ? हम जिस जिस को देख सकते हैं वो सब कासब जगत हैं, और दृश्य हैं और जो देख रहा वो उस दृश्य से भिन्न हैं । मानव के दृश्य को देखने अनुभव करने के पांच प्रकार हैं, पांच प्राण हैं तो पांच रूपों से हम जगत को जान पाते हैंहम आंखों के माध्यम से जगत को देख कर जान सकते है। पर क्या जिसको आंखें नहीं हैं तो क्या वो जगत को जानेगा या नहीं ? या नहीं हां वो भी जगत को जानता हैं। हम आंखें बन्द करके भी बहुत कुछ देखते हैं, वहाँ हमारे अंतर की ज्योति, जो आंखों को भी देखने की शक्ति प्रदान कर रही हैं उसके माध्यम से जान सकते हैं, उस अंतर ज्योति को ही जानना,जगाना,अनुभव करने के लिए यह बाहरी ज्योति हैं जैसे हम कानों से दुन कर जान सकते है। नाक से सुगंध द्वारा या स्वास लेने छोडने के कार्य से जान सकते हैं। पर इन पांचों इन्द्रियों के पिच्छे जानने वाला एक हैं या पांच अलग अलग हैं ? यह सवाल हैं महत्व का। जो सुन रहा वो कौन ? जो देख रहा वो कौन, जो स्पर्श को जान रहा वो कौन ? यह सब भिन्न भिन्न तरह से जानकारी देने वाली पांचों इन्द्रयों के ज्ञान को कोई पांच जानने वाले नहीं हैं ?

जानने वाला एक ही हैं, और वो जो जानने वाली ज्योति हैं उसको जानने के लिए साधना हैं, जो जानने वाली ज्योति वो पैदा नहीं होती प्रकट होती हैं, तो प्रकट होने वाली ज्योति को जानने पहचानने के लिए ही साधना है। मानो की किसी ने अग्नि प्रकट की और आपने उससे ज्योति या चिन्गारी लेकर दुसरी जगह अग्नि जलाली, पैदा करलीपर वो बुझ गयी, और अब आपको अग्नि प्रकट करना नहीं आता तो आप क्या करेगें ? आता तो आप क्या करेगें ? कोई बतायेगा कि, ऐसे अरणी मंथन करो या बांस से बांस को टकराने का इंतजार करो ,या दो कठोर पत्थर को आपस में घर्षण करो, तो अग्नि प्रकट होगीतब कार्य आगे बढ़ेगा ? बीजली तार में आ रही बल्ब लगा हैं। तो मात्र बटन दबाया और प्रकास होगया, तो यह पैदा करना हुअ, पर जो बीजली को प्रकट कर रहा हैं या करना चाह रहा हैं तो वो प्रक्रिया कुछ भिन्न हैं, जिसको बिजली कैसे और कहां से प्रकट हो कर कैसे सारी जगह जा रही हैं और एक साथ हजारों लाखों बल्बोम को रोशन कर रोशनी दे रही हैं ? यह जानने का प्रयास करना ही साधना है। तो हमारे में ज्यो देह से भिन्न चेतना हैं ज्योति हैं उसको रामज्योत कहते है। उसको जानने के लिए राम नाम महाराज की सद शरण आवश्यक हां अगर कोई नहीं जानना चाहें तो कोई जरूरी नहीं, उसका जीवन भी व्यतीत होजाता है।

कोई बाधा नहीं हैं, ओर उसको जो सुख दुख देखना होता हैं उसको बार बार भोगना पडता हैं वो उसके स्थायी दुख का कारण हैं, बस उसका जीवन बिना बिजली बिनाबल्ब का हैं, कहीं रोशनी और कहीं अंधकार में वो अपना जीवन व्यतीत करता हैं, परंतु बीजली स्थायी रूप से आजाये तो ? वो सुख उसको नहीं मिल पाता। स्थायी सुख, सदांन्द, अर्थात परमानन्द की अवस्था का यदा कदा भान उसको गहन निंद्रा में ही मिलेगा,ओर ओहचान वो उसको कभी नहीं पायेगा। बस उसकी अवस्था ऐसी रहेगी कि, करोड़ो रुपये का हीरा जेब में मगर वो उससे अनजान होकर सड़कों पर भीख मांग कर गुजारा करता रहेगा ! रोशनी, हवा, ठण्डी हवा, भोजन बनाने से लेकर सारे काज आसान राम नाम महाराज की शरण में जसकर यह हमारी दिव्य जीवन ज्योति रूपी:--- बिजली क्या है, ? कैसे पैदा होती हैं, कैसे इसको काम में लिया जाता हैं,और क्या क्या काम में लिया जासकता हैं? और कैसे स्थायी प्रकाश ,मतलब परमप्रकाश से एकाकार हुआ जासकता हैरामनामरूपी दर्पण में निगाह गीरते ही, हमें हमारी ही आंखों में हमारे ही द्वारा लगाया गया काजल, जो नहीं दिखाई दे रहा था,वो बिलकुल ही स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता हैं!

अतः हमको रकार और अकार का सामुहिक अनुसंधान करना होगा। रकार की ज्योति से अकार रुपी देह का आकार मिलकर जिसकी अनुभूति कर सकेगें, वो बिना दोनों के संयोग के अलग अलग रहकर भले अपने कार्यों को अंजाम दें मगर पहचान करने वाला कोई नहीं होगाआग जल रही हैं ठीक है। रोशनी हो रही ठीक हैं पर किसके लिये? क्या लाभ ? अतः रकार अकार का सामुहिक जाप,अनुसंधान करके, देह और देह में स्थित जीवन ज्योति की अनुभूति करते हुए यह जीवन ज्योति कहां से आरही हैं और वो मूल रूप में कैसी हैं, की अनुभूति भी , रकार और अकार के सामुहिक जाप, अंकन, मनन, से हो पायेगाअतः नियमित रूप से सदा, राम नाम के अंकन को जीवन में अपनायेंसम्पर्क:- श्री राम नाम धन संग्रह बैंक जवाहर नगर अजमेर