ALL देश / विदेश सम्पादकीय लेख /आलेख अध्यात्म मध्यप्रदेश राजधानी - भोपाल खेल / विज्ञानं एवं टेक्नोलॉजी मनोरंजन / व्यापार रोजगार के पल शाषकीया विज्ञापन रोजगार के पल क्लासिफाइड विज्ञापन
रामनामाकंन प्रकाट्य ज्ञानेन
June 10, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • अध्यात्म

|| नाम-राम -कथा -251 || रामनामाकंन प्रकाट्य ज्ञानेन, ज्ञानेन मुक्ति संभाविताः।। रामनामाकंन से स्वतः अन्तःकरणमें ज्ञान का उदय होता है। ज्ञान से ही जगत के दुःखो का नाश होता हैं। और यह योग मार्ग के साधक जान जाते हैं । 1. रामनामाकंन योगारूढ़ यह अनुभूत कर लेता हैं कि, इस जगत में मानव तन पाकर समस्त दुःखों का क्षय किया जासकता हैं, और उसके लिए पुरुषार्थ ही एक मात्र उपाय हैं ,बिना पुरुषार्थ दुःखो के क्षयः हेतु अन्य कोई मार्ग नहीं, और रामनामाकंन योगारूढ़ता से बढकर इस कलिकाल में कोई पुरुषार्थ नहीं । 2. अतः यह तो स्पष्ट हो ही जाता हैं कि,दुःखो का क्षय पुरुषार्थ से होता हैं। और रामनामाकंन परम पुरुषार्थ हैं। 3. रामनामाकंन योगारूढ़ योगी भाग्य पर भरोसा नहीं करता, वह अपना उद्योगका कदापि त्याग नहीं करता, और उद्योग त्याग कर भाग्य पर भरोसा करने वाला तो स्वयं ही अपना दुश्मन हो जाता है,, उसको और किसी दुश्मन की आवश्यकता ही नहीं । 4. बुद्धि हीन लोग यह समझ सकते है कि, सबकुछ भाग्य के अधीन हैं, और ऐसा समझने वाले कभी भी रामनामाकंन योग को नहीं अपना सकते। रामनामाकंन योग को अपनाने हेतु रामनाममहाराज की शरणागति में सम्पूर्ण भावसे समर्पण आवश्यक, और बुद्धि हीन अथवा कायर व्यक्ति अंतरमन से समर्पित कभी नहीं हो सकता। 5. हां एक भ्रांति व्याप्त हो रखी हैं कि, दैव कृपा होजायेगी। पर रामनामाकंन योगारूढ़ मानव ,, दैव पर कभी विश्वास नहीं करता, उसको दैव से कोई आशा नहीं उसके लिए तो आगे जाकर यह सपष्ट हो जाता हैं कि, दैव ही सब कुछ करता हैं यह मात्र कल्पना हैं भ्रान्ति हैं,। 6. रामनामाकंन योगी अपनी उन्नति स्वयं करता है। या रामनामाकंन से उत्पन्न प्रेमाभक्ति के परम पुरुषार्थ सेवह ब्रह्माण्डीय चाल को परावर्तित करने में स्वयं सक्षम हो जाता हैं, अतः वो अपने आत्माराम, या रामनाममहाराज के प्रबल प्रताप के अतिरिक्त और किसी देव पर भरोसा नहीं करता। मात्र दैव पर भरोसा करके बैठे रहजाना मुर्खता का परिणाम है। 7. हमारे ऋषियों मुनियों, संतो शास्त्रों ने कम बुद्धिमान लोगों को दुःख के समय में आश्वासन हेतु दैव की कल्पना की हैं, कि, दुखी व्यक्ति किसी भी दैव पर भरोसा कर के अपने दुःखों को कम कर सकता हैं। 8. दैवीय कल्पना कोई व्यर्थ भी नहीं हैं मूल में हमारे पूर्व कृत कर्म, पूर्वकृत पुरुषार्थ ही हमारा दैव हैं। जिसका जितना पुरुषार्थ रहा उसी अनुरुप उसका समयपर सहायता मिल जाती हैं अतः इसमें सदा असमानता ही प्रकट हुयी और होती रही हैं । 9. प्रत्येक मानव को इतना पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए कि, जिससे पूर्वकृत अशुभ कर्म शांत हो जाये, अतः यथा संभव ससंकल्प चौरासी लाख बार सप्रेम "रामनाम" का अंकन तो करही लेना चाहिए । क्योंकि रामनामाकंन से बेहतर कोई अन्य उपाय, या साधन, नहीं हैं, जिससे कि, पुर्वकृत शुभाशुभ कर्मफलों का सहज ही नाश किया जा सके ,और कोई नुयतन कर्मफलों के बन्धन से स्वयं को मुक्त रखा जा सके। अतः प्रत्येक मानव को 84 लाख बार रामनाम का अंकन करके, पूर्वकृत कर्मफलों को पूर्णरूपेण शांत कर देना चाहिए। • इस संसार में आलस्य ही मानव का प्रगाढ़ दुश्मन हैं, अगर यह दुश्मन नहीं होता तो प्रत्येक मानव लौकिक जीवन मेंधनी और विद्वान हो सकता था, और परमात्मा को सिद्धकर परमात्माका साक्षात्कार कर लेता। पर आलस्य और प्रमादवश चुपचाप बैठा ,लेटा रह जायेगा पर मुख से राम राम तक नहीं निकाल पाता है। • रामनामाकंन योग ,इसमें हमको स्वयंको ही अपना योग करना होता हैं, उसमें किसी अन्य का सहयोग हमें सिद्धि देने वाला नहीं, है। यह तो स्वयं के भोजन करने से ही स्वयं की भूख प्यास शांत होगी, अतः रामनामाकंन का संकल्प स्वयं ही करके स्वयं ही पूर्ण करना होगा। 1. तीनो लोकों में ऎसा कोई पदार्थ नहीं जो उद्वेग रहित पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सके, चाहे वो तत्त्व से या आत्मासे साक्षात्कार ही क्यों ना हों ? रामनामाकंन हेतु सप्रेम, पूर्ण श्रद्धा विश्वास सहित रामनाममहाराज के प्रति समर्पण से बढकर इस जगत में अन्य कोई पुरुषार्थ ही नहीं है। अतः हम सब अपने अहं को रामनाममहाराज के चरणों में समर्पित करदें। और सप्रेम रामनाममहाराज की पावन शरण को ग्रहण करलें। जैसे ही हम शरणागत होगें, हमारी सारी मानसिक व्यथा तत्क्षण ही निवृत्त हो जायेगी। बस हम गलती यह करते हैं कि,समर्पण करने जाते हुए भी अपने मैं" रुपी अहं को कसकर पकडे रहते हैं, औरजब तक मैं की पकड रहेगी समर्पण का नाटक तो हो जायेगा पर समर्पण नहीं होगा। अतः परम पुरुषार्थ तो पूर्णरूपेण समर्पण से ही होगा। नारद की तरह नहीं कि, नारद कहेऊ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारी सकल भगवाना।।‌ अपने अंदर अहं पालते हुए मुंह से समर्पण दिखाया जाये , तो ऐसा धोखा उस माहन अस्तित्व के साथ असंभव, है। अतः सप्रेम, समर्पण ही पतम पुरुषार्थ होगा। और ससमर्पण ससंकल्प, रामनामाकंन से ही अपने ही अंतर जगत से आत्मज्ञान की विधि स्वयं जाग्रत होती हैं। वो कल। आज अगर आप कर सकें तो अपने आप का पूर्ण समर्पण, रामनाममहाराज की शरण में । जय सियाराम जयति जय जय जय रामनामाकंनम्। 9414002930 bk 8619299909