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रामनामाकंन से प्राप्त होगी दिव्य दृष्टि ।
July 10, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • अध्यात्म

|| नाम राम कथा 276|| रामनामाकंन से प्राप्त होगी दिव्य दृष्टि । भगवान शिव की कृपा प्राप्ति, अर्थात खुलेगा तीसरा नेत्र। यह नैत्र बिना प्रेम के प्रकट हुए नहीं खुलता।

जब तक यह नैत्र नहीं खुलता,तब तक अस्तित्व से अभिन्नता अनुभूत नहीं होसकती। जब तक अभिन्नता अनुभूत नहीं होगी, तब तक स्वर्ग नर्क और अनान्य लोकों में भ्रणण बना रहेगा,जिसे कहते हैं। "भटकाव" ।। * "पुनरपि मरणम् पुनरपि जमनम्""* इस भटकाव की समाप्ति के लिए हैं, भगवान सदाशिव के तिसरे नैत्र से दैखा गया, पहचाना गया,अपनाया गया,और फिर जगत के कल्याण निमित्त बताया गया द्वाक्षरी महामंत्र "राम" । इस भटकाव को मिटाने का और भी सहज सुगम उपाय हैं ,""रामनामाकंनम् "" ! रामनामाकंन अर्थात श्री रामनाम महाराज की शरण में स्थान पाना। क्या होता हैं ,रामनामाकंन से ? रामनामाकंन से, प्रेम का वो स्वरूप प्रकट होता हैं, जो कि हमारा अपना स्वस्वरूप हैं, और जिसके प्रकट होने से हमऔर , अस्तित्व भिन्न नहीं रह जाते । वर्तमान में हमने अपने अहं को महत्व प्रदान किया हुआ हैं, अहं जो कि हमें इस अनंत अस्तित्व से भिन्नानुभूति कराकर चराचर से अलग कर अकेला खडा़ किये दे रहा हैं ।। हर प्राणी को यह लगता हैं कि,वो इस समस्त ब्रह्माण्ड में अकेला खडा़ है।। इस ब्रह्माण्ड से अलग हैं, और उसका इस अस्तित्व से स्पर्धात्मक संबंध हैं। यह भारी भूल कर रहा है। अपना भिन्न अस्तित्व मानना ही तो अहंकार है। अहंकार ही अलंकारित होता है। जो अहंकार को बढ़ाता जाता है। @अहं अहं करोति अहंकारः।।@ मैं मैं मैं करना ही अहंकार है। बस और क्या ? जब तक मैं मैं रहेगा तब तक अहं रहेगा, और इस मूढ़ अहंकार के चलते :- न वो किसी को "अपनाआप" मान सकता हैं और ना ही वो इस अस्तित्व को ( जो कि कभी भी उसको अपने से भिन्न नहीं मानता हैं,) ही अपनाआप मान पाता है। उसके पिच्छे उसका अहंकार ही मुख्य हैं, जो उसको इन सबसे अलग खड़ा करता हैं। और जब तक उसका मैं जितना ठोस रूप धारण किये रहेगा,वैसे ही, उतना ही अहंकार भी ठोस रहेगा। अहंकार अर्थात क्या ? अहंकार अर्थात ""अविद्या "" । अविद्या अर्थात माया का अवास्तविक स्वरूप । माया का वास्तविक स्वरूप विद्या हैं, जिसमे ब्रह्म जगत और मैं एवं हूं में कोई भिन्नता नहीं अनुभूत होती है। वहाँ सब कुछ एक ईकाई हैं। पर "अविद्या" जो कि इस महान सम्पूर्ण अस्तित्व अर्थात ईश्वर से अपने को विलग कर के खडा़ कर लेता हैं, कारण होता हैं मात्र एक विचार कि, " मैं " हूं। यह सब कु़छ जो चलरहा हैं, प्रत्येक प्राणी उसी में उसीका एक हिस्सा हैं, जो उससे कभी भी विलग हो नहीं सकता परंतु वो अपने को विलग कर लेता है।, कैसे ? मूढ़तावश ! सागर से सागर की लहर को कोई कैसे अलग कर सकता हैं ? पर कोई लहर क्षण भर के लिए उठती हैं और अपने को क्षण भर के लिए ही अलग अनुभव कर सकती हैं ,परंतु वो अपने को उस क्षणिक काल में ही बिलग मान कर अपनी नयी दुनिया बना कर अस्तित्व में अपना विलग स्वरूप ,आकार,प्रकार,मान कर एक अमिट छाप छोड़ जाती हैं, और उसको अपनी करणी मान कर उसी में फसीं रह जाती है। वो क्षणिक मान्यता ही उसका बंधंन है। मोटे रूप में विचार करो। कि, सागर में एक लहर उठी, वो सागर के जल से ही उठी, जितनी तेज हवा बही उसके बल पर उठी, और तेज हवा के झोंके से तेज गति से ऊंची उठी लहर का इसमें अपना कोई प्रताप नहीं होता है। , उसी क्षण अनंत लहरें और भी उठी, वो उससे उतनी ऊंचाई को नहीं छू रही, पर उठी और अस्त होगयी। पर इस लहर की ऊंचाई ने इस में अहं भर दिया कि, मैरे जैसा कोई नहीं ? क्योंकि लहर ही लाभ हानि पहुंचाने में सक्षम हो सकती हैं, शांत सागर जो कि, अनंत जल का स्वामी निधिपति है। जलनिधिपति है। वो किसीको हानिलाभ नहीं पहुँचाता, न वो किनारे तोडता हैं, न वो किसी नाव या जहाज को डुबोता हैं न वो किसी के लहरों की भांति अपने साथ बहा कर ले जाता है। पर लहर यह सब करती है। और लहर का यह गुण उसमें कर्तापन का अहं जाग्रत कर देता है। बस यह इतना सा क्षणिक सोच उसका बन्धन होगया और जब तक यह सोच उसमें रहेगा तब तक वो वापस सागर नहीं बन पायेगी,। हां लहर के रूप में तो वो उसी क्षण समाप्‍त हो जायेगी पर प्रकृति के केमरे में उसका वो चित्र स्थाई हो जायेगा। क्योंकि जो चित्र प्रकृति के केमरे में खिंच गया उसको तो मिटाना फिर रामकृपा से ही संभव हैं वरणा प्रकृति के इतिहास में वो सदा स्थाई रहता हैं और वो ही उसके बन्धन का कारण बना रहता है। वो चित्र उस लहर को मिटने के बाद भी स्मृति में जिंदा बनाये रख कर उसको कठोर बन्धन में बांधे विलगतानुभूति कराते हुए उसको सुख दुख पहुंचाने की मान्यता बनाये रखने का सामर्थ्य रखता है। लहर मिटने के बाद भी पुनःउसी रूप में लहर नहीं बन पाती है।, ! उस समय जो बडी विसाल लहर बनी थी, उसकी स्मृति मात्र बूलबूले के रूपमें सागर में रहते हुए भी सागर से स्वयं को भिन्न मानते हुए सागर में ही विद्यमान रहते हुए ही अपनी डफली बजाते घूमते रहकर बनेगा फुटेगा बनेगा फूटेगा पर अंह के चलते सागर से एकता अनुभूत नहीं कर पायेगा बस यही मान्यता उसका बंधंन बन उसे झकडे़ रखेगा। यही स्थिति हमारी हैं । और यह बिना तीसरी आंख खुले नहीं दिखाई देती हैं, चाहे जितने जतन करलो, चाहे जितने प्रयास करलो। बस रामकृपा से किसी को रामनाम महाराज की शरण मिल जाये तो यह गांठ छूटे। जो हैं ही नहीं उसकी मान्यता मान कर बैठे रहना, यही तो गांठ है। । (चिज्जड़ ग्रन्थि) एक क्षण की उठी लहर, हवा के बल पर उठी, सागर के झल से उठी, सागर का की सारा जल लेकर उठी, लहर उठने से पहले भी वो सागर का जल थी, अभी लहर के रूप में भी वो सागर का ही जल हैं, और हवा का झोंका कम होते ही वो वापस सागर में मिल कर पुनः वो का वो ही सागर का जल हैं, । दुबारा जो लहर बन रही है उसमें जल की वो कि वो बूंदे कभी भी एक नहीं होती है, जो पहले वाली लहर में थी। वो बूंदे कभी भी समान रूप से न तो; वही हवा का झोंकां पा सकती हैं, और ना, ही , वही जलबून्दे जो पहले वाली लहर में थी। अच्छा सागर की गहनता का जानने वाले या सागर के जिसने भी दर्शन किये हैं, वो अनुमान लगा सकते हैं,कि, एक बार जिस भी लहर में जो जलकण सामिल होते हैं, वो ही जलकण वापस उसी जगह उठने वाली नयी लहर में भी वही जलकण होंगें? ऐसा कभी भी संभव नहीं, किसी काल नहीं हो सकता! वैसी लहर कभी भी दुबारा नहीं बन सकती हैं, ,पर उस एक दो पांच या सात पलों के लिये लीये गये लहर के आकार ने स्वयं को भिन्नता की मान्यता देकर सदा के लिए अपने को महासागर से एक तुच्छ सा अस्तित्व देकर विलगता का स्वरुप मानने का जो अहं पाला, वो स्पष्ट रुप से भ्रम हैं, पर उस भ्रम को वो स्वयं मिटा नहीं पाता, यह समस्या है। । यही बिलकुल यही मानव जीवन की हमारी लहर का कार्य है। अब यह मिटे कैसे ? यह मिटे तीसरे नयन के खुलने से, वो तीसरा नयन जो सागर को, सागर में चली हवा को ,और हवा के झोंकें से सागर के जल से बनी लहर को, और लहर की उंचाई को, और पुनः लहर के समाप्त होकर सागर में समाजाने के बाद भी बुलबूला बन विलगता अनुभव करने की अवस्थाओं को दिखा सके। जो यह प्रकट रूप से दिखा सकता हैं ,उसको कहते हैं, दिव्य दृष्टि । इस दृष्टि को ही तो शिवजी का तीसरा नैत्र कहा गया है। क्योंकि यह दृष्टि वर्तमान दृष्टि से दृष्टिगोचर नहीं होसकती, इसके लिए वो दृष्टि चाहिए जो कि, इन सबकी गतियों को देख सके। और सबको अपनी अस्तित्व के साथ एकता अनुभव करा सके, उनकी भिन्न होने की भिन्न सोच को मिटा सके। और यह होगा रामनाममहाराज की शरण में जाने से। वहाँ से यह तीसरी दृष्टि जाग्रत होगी, जिसका जनक प्रेम है। और यह प्रेम, तो रामका स्वरूप हैं? राम का जो स्वरूप है। वो ही रामनाम का स्वरूप है। क्रमशः आगे कल:- रामनामाकंन करने हेतु सम्पर्क 9414002930. 9414002931 8619299909. 8955074141 0145-2422492