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थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना ।। मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, अपनों के बिना ।। - श्रीमती संगीता साहू बरझर मध्यप्रदेश
June 23, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • लेख /आलेख

जो कह दिया वह *शब्द* थे ;

जो नहीं कह सके वो *अनुभूति* थी ।।

और, जो कहना है मगर ;

कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।।

*जिंदगी* का क्या है ? आ कर *नहाया*,

और, *नहाकर* चल दिए ।। *

बात पर गौर करना*- ---- *

पत्तों* सी होती है कई *रिश्तों की उम्र*,

आज *हरे*-------! कल *सूखे* -------!

क्यों न हम, *जड़ों* से; रिश्ते निभाना सीखें ।।

रिश्तों को निभाने के लिए,

कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*,

और कभी *बहरा* ; होना ही पड़ता है ।।

*बरसात* गिरी और *कानों* में इतना कह गई कि---------! *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती ।।

*नसीहत*, *नर्म लहजे* में ही अच्छी लगती है ।

क्योंकि, *दस्तक का मकसद*,

*दरवाजा* खुलवाना होता है; तोड़ना नहीं ।।

*घमंड*-----------! किसी का भी नहीं रहा,

*टूटने से पहले* , *गुल्लक* को भी लगता है कि ;

*सारे पैसे उसी के हैं* ।

जिस बात पर , कोई *मुस्कुरा* दे;

बात --------! बस वही *खूबसूरत* है ।।

थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना ।।

मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, अपनों के बिना ।।