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उमस भरी गर्मी कितनी ख़तरनाक हो सकती है? वे ख़तरनाक स्थितियां जिनमें गर्मी और उमस एक साथ सामने आती हैं, वे पूरी दुनिया में होती दिख रही हैं.
May 23, 2020 • Mr. Dinesh Sahu • देश / विदेश

जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाले लंबे समय से चेतावनी देते आ रहे हैं कि साल 2070 तक पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि यहां रहना लगभग मुमकिन नहीं होगा. लेकिन साइंस एडवांसेज़ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कई जगहों पर ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिनके बारे में अब तक चेतावनी दी जाती थी. इस अध्ययन के लेखक कहते हैं ये खतरनाक स्थितियां जिनमें गर्मी और उमस एक साथ सामने आती हैं, वे पूरी दुनिया में होती दिख रही हैं. हालांकि, ये स्थितियां बस कुछ घंटों के लिए रहती हैं लेकिन इनके होने की संख्या और गंभीरता बढ़ती जा रही है. इन शोधार्थियों ने साल 1980 से 2019 के बीच मौसम की जानकारी देने वाले 7877 अलग-अलग स्टेशनों के प्रति घंटे के डेटा का विश्लेषण किया है.इस विश्लेषण में ये सामने आया है कि कुछ उप-उष्णकटिबंधीय तटीय इलाकों में बेहद गर्मी और उमस मिश्रित मौसम की आवृतियां आवृतियां दुगनी हो गई हैं. इस तरह की हर एक घटना में गर्मी और उमस मिली होती है जो कि एक लंबे समय तक खतरनाक साबित हो सकती है.

कहां हो रही हैं ये घटनाएं? इस तरह की घटनाएं लगातार भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, उत्तरी-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, लाल सागर के तटीय क्षेत्र और कैलिफॉर्निया की की खाड़ी में नज़र आ रही हैं. इनमें से सबसे ज़्यादा खतरनाक आंकड़े सऊदी अरब के धहरान/दमान, क़तर के दोहा, संयुक्त अरब अमीरात के रस अल खमैया शहरों शहरों में 14 बार दर्ज किए गए. इन शहरों बीस लाख से ज़्यादा लोग रहे हैं. इमेज कॉपीरइट ETTY IMAGES

कितनी गर्मी जानलेवा हो सकती है? दुनिया भर में ज़्यादातर मौसम विज्ञान केंद्र दो थर्मामीटरों से तापमान का आकलन करते हैं. पहला ड्राई बल्ब उपकरण हवा का तापमान हासिल करता है. ये वो आंकड़ा है जो कि आप अपने फोन या टीवी पर अपने शहर के तापमान के रूप में देखते हैं. एक अन्य उपकरण वेट बल्ब थर्मामीटर होता है. ये उपकरण हवा में उमस को रिकॉर्ड करता है. इसमें एक थर्मामीटर को कपड़े में लपेट कर तापमान लिया जाता है. सामान्यत: ये तापमान खुली हवा के तापमान से कम होता है. इंसानों के लिए बहुत तेज उमस भरी गर्मी जानलेवा साबित हो सकती है. इसी वजह से वेट बल्ब की रीडिंग जिसे 'फील्स लाइक कहा जाता है, उसकी रीडिंग बहुत अहम होती है.

कुछ गंभीर मामलों में ये भी हो सकता है कि ये प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाए. ऐसे में किसी व्यक्ति को एक एयर-कंडीशंड कमरे में जाना पड़ेगा क्योंकि शरीर का अंदरूनी तापमान ये गर्मी बर्दाश्त करने की सीमा के पार चला जाएगा जिसके बाद शारीरिक अंग काम करना बंद कर देंगे.

ज़्यादा जानकारी ज़रूरी क्यों है? कॉलिन कहते हैं, "हमारा अध्ययन पिछले अध्ययनों से पूरी तरह सहमत है कि किसी मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के स्तर पर 35 डिग्री सेल्सियस वेट बल्ब तापमान 2100 तक एक सामान्य बात होगी. हमने इसमें सिर्फ ये जोड़ा है कि ये घटनाएं छोटी जगहों पर कम समय पर होना शुरू हो गई हैं. ऐसे में हाई रिज़ॉल्युशन डेटा बेहद ज़रूरी है."

सबसे ज़्यादा जोख़िम किसे है? ऐसी घटनाएं ज़्यादातर तटीय क्षेत्रों, खाड़ियों और जलसंधियों में हो रही हैं जहां पर भाप बनकर उड़ रहा समुद्री जल गर्म हवा में मिलने की संभावना पैदा करता है. अध्ययन बताते हैं कि ज़्यादातर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश में 2100 तक ऐसा तापमान बना रहेगा जिसमें जिंदा रहा जा सकता है. ये समुद्री जलस्तर के अत्यधिक तापमान और महाद्विपीय गर्मी का संगम है जो कि उमस भरी गर्मी पैदा कर सकता है.

कोलिन कहते हैं, "हाई रिज़ॉल्युशन डेटा हमें ये समझने में मदद कर सकता है कि किन जगहों पर लोगों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ सकता है और अगर ऐसी स्थिति पैदा होने वाली हो तो हम लोगों को किस तरह चेतावनी दे सकते हैं. इससे उन्हें एयर कंडीशन, घर के बाहर रहकर काम नहीं करने और दीर्घकालिक कदम उठाने के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है." अगर कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो इस तरह की घटनाओं का बढ़ना लाज़मी है ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी में क्लाइमेटेलॉजिस्ट स्टीवन शेरवुड कहते हैं, "ये आकलन बताते हैं कि पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों में जल्द ही ऐसी गर्मी हो जाएगी कि यहां रहना मुमकिन नहीं होगा. पहले ये माना जाता था कि हमारे पास काफ़ी सेफ़्टी ऑफ़ मार्जिन यानि जोखिम काफ़ी दूर है."